सुनील उपाध्याय
बस्तीः सांई कृपा संस्थान की ओर से टाउन हाल में आयोजित संगीतमयी सांई कथा में रोजाना भक्तों की भीड़ उमड़ रही है। करीब तीन घण्टे चलने वाली कथा में समाज का हर तबका हिस्सा ले रहा है। तीसरे दिन कथावाचक उमाशंकर जी महराज ने बाबा की प्रेरक लीलाओं का वर्णन बहुत ही मार्मिक ढंग से किया।
उन्होने कहा कि सांई बाबा चमत्कार लोक कल्याण के लिये हाते थे। वे स्वयं अपने कृत्यों से ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करते थे कि लोग उससे प्रभावित होकर अपनी सोच बदलें और सदमार्ग तथा लोक कल्याण के रास्ते पर चल पड़ें। बाबा ने कभी जाति धर्म, ऊंच नीच के आधार पर समाज को बांटने का प्रयास नही किया बल्कि वे कहा करते थे कि हर किसी को अपनी सामर्थ्य के अनुसार दूसरों की मदद को तैयार रहना चाहिये। बाबा की लीलाओं पर प्रकाश डालते हुये कहा कि बाबा के सबसे निकट रहने वाला भक्त शामा था, उसका वास्तविक नाम माधवराव था। शिरडी गांव वालों का इलाज करने वाले वैद्य कुलकर्णी सरकार का रिश्तेदार था।
कुलकर्णी ने उसे द्वारकामाई के निकट स्थित एक स्कूल में अध्यापक नियुक्त करवा दिया था जिससे वह बाबा की लीलाओं और उनकी दिनचर्या तथा इलाज के तरीकों को उन तक पहुंचाये और वह बाबा को बदनाम करने की साजिश सच सके, जैसा कि वह पहले भी कई बार कर चुका था। शामा द्वारकामाई के सामने होने के कारण हमेशा बाबा की गतिविधियों पर नजर रखने लगा। रात में जब वह ध्यानमग्न होते तो उसे बाबा के चारों ओर अदभुत प्रकाश और कानों में बांसूरी की धुन सुनाई देती थी। धीरे धीरे शामा का भ्रम टूटने लगा और वह बाबा के निकट आने लगा। बाबा भी उसे स्नेह देने लगे जिससे वह उनका सबसे चहेता भक्त बन गया।
लेकिन कुलकर्णी के संपर्क में रहने के कारण उसके मन में अब भी नकारात्मक विचार आते थे। एक दिन बाबा के एक भक्त ने बाबा के नाम से दो रूपये मनीआर्डर भेजा, बाबा को न बताकर शामा ने उसे जमीन के भीतर गाड़ दिया। उसी दिन रात में शामा के घर खेरी हो गयी और चोरों ने करीब 200 रूपये पर हाथ साफ कर दिया। घटना के बाद वह बाबा के पास पहुंचा और बोला आपके संपर्क में रहने के बावजूद उसके घर में चोरी हुई, जब आप हमें इतने भारी नुकसान से नहीं बचा सकते तो आपकी भक्ति के लाभ।
बाबा ने कहा तुमने एक फकीर के दो रूपये गायब कर दिये, उसकी शिकायत दर्ज कराने कहां जाये। फकीर का दो रूपया तुम्हारे 200 के बराबर है। शामा बाबा का जवाब सुनकर स्तब्ध रह गया। उसकी नियत खराब नही थी, वह केवल बाबा की परीक्षा लेना चाहता था। लेकिन इस घटना के बाद उसके आखों पर बंधी पट्टी खुल गयी और वह बाबा का अनन्य भक्त हो गया। कथा के बीच में ‘एक नजर दया की कर दो, हे बाबा शिरडी वाले, जनम जनम का सा है तुम्हारा हमारा‘ भजनों पर श्रोता झूमते रहे।
कथा को सफल बनाने में डा. प्रकाश, श्यामजी श्रीवास्तव, मंजुल ज्योति, अरूण प्रकाश श्रीवास्तव, सूरज पाण्डेय, राजेश, दिनेश चन्द्र श्रीवास्तव, जितेन्द्र तिवारी, एसके नंदन, तरूण श्रीवास्तव, अश्विनी अग्रवाल, अशोक श्रीवास्तव आदि ने योगदान दिया।


एक टिप्पणी भेजें
0 टिप्पणियाँ