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डगर भरी हो चाहे कितनी भी कांटों से

वह चिर पथिक ! 
संज्ञान विस्मृत
भटकता कभी कभी चलता
संवेदनाओं और वेदनाओं का आभास
नही मिल रही हरित कांति 
न कोई हरी भरी डगर
खंडहर सा होता
यह हरित आवास।
मंडरा रहे बादल
झूम रही बारिश
हवा भी गा रही गीत बेमेल
विख्यात है इस धरा पर वो क्षुब्ध परिहास!
रोता है वह पथिक, कभी हंसता है
फिर भी चलता निडर, निष्पक्ष
डगर भरी हो चाहे कितनी भी कांटों से
फिर भी रचना है एक विशेष इतिहास!
पत्तियाँ भी हिल रहीं, हर कण स्वागताकांक्षी है
हर क्षण है नक्षत्र
हर परिहास है एक असीमित आकाश।
पर उस पथिक को जब तक है स्वयं पर विश्वास
लक्ष्य न लेगा तब तक अवकाश।


Gargi Tripathi

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