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बदहाल डिस्ट्रिक्ट हास्पिटल: डेड बाडी ले जानें के लिए एम्बुलेंस का करना पड़ता है वेट, 1 बेड पर 3 पेशेंटों का होता है ट्रीटमेंट


खुर्शीद खान 
सुल्तानपुर. गोरखपुर में 30 से ज़्यादा बच्चों की मौत के बाद सरकार चौतरफा घिर गई थी, हर एक सरकार पर उंगली उठा रहा था। बावजूद इसके यहां जिला अस्पताल के अधिकारी और कर्मचारी सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं। आलम ये है कि डाक्टरों की लापरवाही के चलते हार्ट अटैक से पेशेंट की मौत होती है और अटेंडेंट को न तो स्ट्रेचर मिलता है और न डेड बाडी घर ले जानें के लिए एम्बुलेंस। यही नहीं 
पेशेंट को अस्पताल परिसर के अंदर होने के नाम पर 20 का टोकन लिया जा रहा है और इमरजेंसी रूम में एक ही टेबल पर 3-3 पेशेंटों का ट्रीटमेंट चल रहा है। 

घंटों बाडी लेकर वाहन का इन्तेज़ार करते रहे अटेंडेंट
मंगलवार को सुल्तानपुर के डिस्ट्रिक्ट हास्पिटल का जो नज़ारा कैमरे में कैद हुआ उसने हास्पिटल प्रशासन की पोल के साथ गोरखपुर ट्रेजडी की झलक भी दिखा दिया। हास्पिटल के एमरजेंसी रूम के बाहर कोतवाली नगर के अंकारीपुर निवासी मोतीलाल अपने मरे हुए पेशेंट को लेकर इसलिए घंटों से बैठा था के उसे डेड बाडी ले जानें के लिए सवारी का इन्तेज़ाम नहीं हो पा रहा था। मोतीलाल को इस परेशानी का सामना तब करना पड़ रहा है जब कि सरकार ने पेशेंट क्या डेड बाडी ले जानें के लिए एम्बुलेंस की व्यवस्था कर रखा है। मगर ये मुमकिन तब है जब ज़िम्मेदार सुध लें, पर वो तो एसी चैम्बर में बैठकर मौज काटने में जुटे होते हैं।

20 रुपए देना पड़ रहा शुल्क
यही नहीं हास्पिटल के एमरजेंसी रूम का आलम ये है के कुल पांच बेड हैं, वायरल फीवर आदि का मौसम है। ऐसे में एक ही बेड पर तीन-तीन पेशेंटों का ट्रीटमेंट हो रहा है। पेशेंट को रिलीफ हुई हो या नहीं इससे डाक्टर को कोई सरोकार नही है, अगर सीरियस या एक्सीडेंटल केस आ गए तो इन पेशेंटों को बेड छोड़ना ही है। यही नही एमरजेन्सी के बाहर कौन ट्रीटमेंट के अभाव में पड़ा है उसको देखने वाला कोई नहीं है।
पेशेंट के अटेंडेंट बताते हैं कि अब तो पेशेंट की इंट्री के लिए 20 रुपए शुल्क देना पड़ रहा है।

ज़मीन और बेंच पर हो रहा ट्रीटमेंट
हाँ हास्पिटल कैम्पस के अंदर कैमरे के फ्लैश के चमकते ही कैम्पस में हड़कम्प ज़रूर मच गया। सफाई कर्मियों ने हास्पिटल  कैम्पस को साफ करने के लिए हाथों में झाडू अवश्य उठा लिए।
लेकिन अव्यवस्था का आलम ये के पेशेंट को वार्ड में बेड नसीब नहीं है किसी का ट्रीटमेंट ज़मीन पर लेट कर हो रहा है तो किसी के फ्रैक्चर हाथ का ट्रीटमेंट बेंज पर लेटकर। और डॉक्टर अपनी ड्यूटी के बजाए टाइम पास करने लगे हुए थे। हैरत तो इस बात पर है कि जब प्रभारी मंत्री या सरकार के दूसरे मंत्रियों का आगमन होता है तब हास्पिटल के डाक्टरों का क्या कहना सभी  बिल्कुल सही ढंग से कार्य करते हुए दिखाई पड़ते है।


CMS बोले संज्ञान में नहीं मामला
वही जब इस पूरे मामले पर प्रभारी CMS डा. बी.बी. सिंह से बातचीत किया गया तो उन्होंने  रटा रटाया जबाब दिया, मामला मेरे संज्ञान में नही है अगर इसमें कोई दोषी पाया जाएगा तो उस पर कार्यवाही की जाएगी। आमतौर से लापरवाह अधिकारी यही जवाब देते हैं। सवाल यहीं पर खड़ा होता है कि क्या मीडिया के पहल करने पर ही चिकित्सा अधिकारी की आंख खुलेगी और वो सुध लेंगे?

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