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रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद एवं सुप्रीम कोर्ट की विशेष सुनवाई पर विशेष



अमरजीत सिंह 
   फैजाबाद :इस अध्यात्मिक देश में जबसे लोकतंत्र की स्थापना हुयी है तबसे राजनीति ने इस विश्वगुरु माने जाने वाले देश की धर्म संस्कृति इतिहास भूगोल सब छिन्न भिन्न होने लगा है।एक समय था जबकि हमारी मानवीय कौमी एकता अखंडता धर्म संस्कृति  दुनिया में सिरमौर थी।करीब तेरह सौ साल की मुगलों व अंग्रेजों की गुलामी ने हमारे देश के मूल स्वरूप को ही बिगाड़ कर रख दिया। मुगल शासनकाल में फैलायी गयी नफरत व किये गये धार्मिक कारनामे आजादी के समय से ही साम्प्रदायिकता को हवा देने लगे हैं।आज हमारा देश उसी साम्प्रदायिकता की आग में सुलगने और जलने लगा है।कल छः दिसम्बर था और इसी दिन को हिन्दू शौर्य दिवस और.मुसलमान काले दिवस के रूप में मनाते हैं। वैसे काला पीला एवं शौर्य दिवस मनाने वालों में आम लोग कम और राजनैतिक स्वार्थ सिद्धि एवं धार्मिक उन्माद फैलाकर अपनी दूकान चलाने वाले ज्यादा हैं। इसी दिन छः दिसम्बर उन्नीस सौ नब्बे को लाख बंदिशों के बावजूद अयोध्या में रामभक्तों के उमड़े जनसैलाब ने मुगल शासक काल में बनी बाबरी मस्जिद को विध्वंस कर दिया था। यह मामला उसी समय से अदालत के विचाराधीन चल रहा है तथा उच्च न्यायालय इस मुकदमें अपना फैसला रामजन्मभूमि व बाबरी मस्जिद के आंतरिक मूल स्वरूप की तकनीकी जांच करवाकर सुना चुका है। उच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध दोनों पक्ष असहमति जताते हुये उच्चतम न्यायालय में अपील कर चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को आपसी सहमति के आधार पर विवाद सुलझाने की अपील करने के बाद जल्द निपटारे के लिये तीन सदस्यीय खंडपीठ का गठन कर दिया है जिसने परसों ही इस मुकदमें की पहली सुनवाई भी शुरू कर दी गई है।पहली सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के वकीलों की विभिन्न विवाद के जल्द निपटारे में बाधक तर्कों पर कड़ा एतराज जताते हुये दो हजार उन्नीस के बाद फैसला सुनाने जैसी तमाम मांगों को सिरे से खारिज कर चुका है।आजादी के बाद से ही रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद का विवाद अदालत में स्वामित्व को लेकर चल रहा है लेकिन इसे इस लोकतांत्रिक देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि इस मुकदमें का निपटारा आजतक नही हो सका है।इस वाद में अदालतें राजनीति का अखाड़ा बनी हुयी हैं और वकील अधिवक्ता के साथ साथ दोनों पक्षों के राजनैतिक प्रवक्ता बनकर दलील कम अप्रसांगिक भाषण ज्यादा दे रहें हैं। वैसे ऐसे मामलों में राजनैतिक दलों के नेताओं को वकील के रूप में शामिल होने की अनुमति ही नही होनी चाहिए। इस विवाद को जल्दी समाप्त करने की जगह इसे बढ़ाने की मांग करना इस विवाद को जिंदा रखकर कौमी एकता को साम्प्रदायिक हिंसा व आग में झोंकने की साजिश जैसा है। सुप्रीम कोर्ट जब इस विवाद को जल्दी से जल्दी निपटाने के मूड में आया है तो राजनीति उसमें बाधा बनकर खड़ी हो रही है। राजनैतिक स्वार्थी लोगों को इस.बात से कोई वास्ता नहीं है कि इस विवाद से देश की कौमी एकता अखंडता सद्भावना को क्षति हो रही है और आतंकवाद को पनाह मिलने लगा है।इस विवाद के मूल पक्षकारों महंत परमहंस दास और मोहम्मद हाशिम की अंतिम इच्छा विवाद निपटारे और भव्य राम मंदिर बनने की इसी राजनीति के चलते पूरी नहीं हो सकी। इस विवाद का निपटारा जल्द से जल्द होना ही राष्ट्रहित में होगा और अदालत को इसमें अब राजनैतिक अधिवक्ताओं के राजनैतिक बहस सुनने की ज्यादा जरूरत नहीं बल्कि अभिलेखों एवं जांज रिपोटों का अध्ययन करके मालिकाना हक निर्धारित करने की आवश्यकता है।क्योंकि पिछले ढाई दशकों से सुनवाई और बहसों दलीलों और अपीलों का ही दौर चल रहा है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के बाद कोई कोर्ट नहीं बची है।सुप्रीम कोर्ट को न्याय के तराजू पर ईश्वर गाड अल्लाह गुरूनानक ईशा मसीह और बुद्ध को हाजिर नाजिर मानकर आँख मूंदकर जल्द से जल्द अपना फैसला सुना देना ही न्यायहित में है

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