BALRAMPUR...मनोकामनाओं को पूरा करती हैं मां पटमेश्वरी देवी

अखिलेश्वर तिवारी बलरामपुर/ गोण्डा ।। "या देवी सर्वभूतेषु पटमेश्वरी रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।" जनपद...



अखिलेश्वर तिवारी

बलरामपुर/ गोण्डा ।। "या देवी सर्वभूतेषु पटमेश्वरी रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।" जनपद बलरामपुर व गोंडा के सीमावर्ती क्षेत्र में स्थित आदिशक्ति मां पटमेश्वरी देवी का प्राचीनतम स्थान विद्यमान है । इस स्थान पर मां पटमेश्वरी देवी पिंडी के रूप में विराजमान हैं । पटमेश्वरी देवी का यह सिद्ध स्थान बलरामपुर गोंडा सहित आसपास के जनपदों के हजारों श्रद्धालुओं के लिए आस्था और विश्वास का केंद्र बना हुआ है। मां पटमेश्वरी देवी के स्थान पर प्रत्येक माह के शुक्रवार तथा सोमवार को पटमेश्वरी देवी के दर्शन हेतु श्रद्धालु बड़ी संख्या में जुटते हैं । नवरात्र के दिनों में सुबह से शाम तक श्रद्धालुओं की भीड़ जुटी रहती है । कोरोना काल के दौरान भी लोग सोशल डिस्टेंसिंग का अनुपालन करते हुए मां पटमेश्वरी का दर्शन लगातार कर रहे हैं ।



मिली जानकारी के अनुसार न्यू बात के वशिष्ठ भवन हिंदू धाम अयोध्या जी के पीठाधीश्वर महंत डॉक्टर राम विलास वेदांती ने अपने आध्यात्मिक ज्ञान के आधार पर इस स्थान के पौराणिक महत्व का वर्णन किया है । वेदांती जी के अनुसार पुरातन काल में एक बार भगवान शंकर कैलाश पर्वत से मां सती के साथ श्री राम कथा श्रवण करने के लिए अगस्त मुनि के आश्रम जा रहे थे। रास्ते में कुसुम लताओं से सुसज्जित रमणीय एक वन क्षेत्र दिखाई दिया । क्षेत्र की सुंदरता व प्राकृतिक मनोरम दृश्य से मोहित होकर मां सती ने भगवान शंकर से इस स्थान पर रुककर रात्रि विश्राम की इच्छा प्रकट की। मां सती की इच्छा का सम्मान करते हुए भगवान शंकर रात्रि विश्राम के लिए रुक गए। भगवान शंकर ने रात्रि में मां सती को इसी स्थान पर आध्यात्मिक ज्ञान भी प्रदान किया, जिससे माता की अलौकिक इच्छाओं की पूर्ति हुई । प्रातः होते ही भगवान शंकर माता सती के साथ वहां से अगस्त ऋषि के आश्रम के लिए रवाना हो गए। जाते समय माता सती के इस स्थान को गुप्तेश्वरी देवी के रूप में विकसित होने किच्छा को देखते हुए भगवान शंकर ने इस स्थान को गुप्तेश्वर देवी के नाम से प्रसिद्ध होने का वरदान दिया । तभी से यह स्थान गुप्तेश्वरी देवी के नाम से जाना जाने लगा । लोग अपने मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए यहां पर आते हैं और मान्यता है कि उनकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है ।


गुप्तेश्वर देवी कैसे बनी पटमेश्वरी

आदिकाल में गुप्तेश्वरी देवी के नाम से प्रसिद्ध पटमेश्वरी देवी के विषय में बताया जा रहा है कि किसी काल में मेहनौन क्षेत्र के राजा कनीज वाकड़ हुआ करता था । अधर्मी मानसिकता से ग्रस्त कनीज वाकर काफी कुकर्मी व अधर्मी भी था । वह क्षेत्र के नवविवाहिता बहुओं की डोली को पहले अपने महल में उतरवाता तथा कुकृत्य करने के बाद आगे जाने की इजाजत देता था । अन्यायी राजा से क्षेत्र के लोग काफी परेशान तथा भयभीत थे । सभी लोग मां गुप्तेश्वरी देवी से राजा से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की ।स्थानीय लोगों की प्रार्थना मां गुप्तेश्वरी देवी ने स्वीकार करते हुए अपनी माया द्वारा पटमेश्वरी नामक नव विवाहिता के रूप में डोली चढ़कर आगे बढ़ीं । अपने पुराने नियमों के अनुसार अधर्मी राजा कनीज वाकड़ ने पटमेश्वरी देवी के डोली को अपने महल के पास उतरवायाा । राजा कनीज वाकड़ ने अपने आदत के अनुरूप पटमेश्वरी देवी के साथ अभद्रता करने का प्रयास किया, तभी पटमेश्वरी देवी ने उसका वध कर दिया और स्वयं के अस्तित्व को भी समाप्त कर लिया । बताया जा रहा है कि तभी से मां गुप्तेश्वरी देवी गोंडा जिले के मेहनौन नामक स्थान पर मां पटमेश्वरी देवी पिंडी के रूप में विराजमान है । मान्यता है कि प्रत्येक माह के शुक्रवार तथा सोमवार को मां के दर्शन करके  श्रद्धालुओं की सभी मनोकामनाएं  अवश्य पूर्ण होती हैं ।

 
कैसे बना मंदिर

  मां पटमेश्वरी देवी के मंदिर निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाले पंडित रामानंद तिवारी ने बताया कि गोंडा जिले के थाना धानेपुर क्षेत्र के मेहनौन नामक कस्बे के पास स्थित पटमेश्वरी देवी पुष्प लता तथा झाड़ झंकार से सुसज्जित प्राकृतिक सौंदर्य वाले क्षेत्र में पिंडी के रूप में विराजमान थीं । हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए प्रतिदिन आया करते थे । श्रद्धालुओं के अंदर मां की मंदिर बनाने की इच्छा जाहिर हुई । श्रद्धालुओं ने मंदिर बनाने का प्रयास कई बार किया, परंतु मंदिर निर्माण नहीं हो पा रहा था । दिन भर बनाए गए मंदिर रात में गिर जाया करता था, जिसके कारण अंततः लोगों ने मंदिर निर्माण का इरादा त्याग दिया । बताया जा रहा है कि 300 से अधिक वर्षों तक मंदिर बनाने का प्रयास नहीं किया गया, जिसके बाद एक बार फिर स्थानीय लोगों ने तत्कालीन विधायक नंदिता शुक्ला से मंदिर बनवाने की इच्छा जाहिर की। पूर्व विधायक नंदिता शुक्ला ने स्वयं आकर मां पटमेश्वरी देवी के दरबार में प्रार्थना की और मंदिर निर्माण पूरा कराने के लिए निवेदन किया । मां की अनुमति के बाद नंदिता शुक्ला की अगुवाई में स्थानीय लोगों के सहयोग से मंदिर निर्माण 6 दिसंबर वर्ष 2014 में शुरू हुआ। मंदिर  के गर्भ गृह से लेकर आंतरिक निर्माण लगभग पूरा हो चुका है। ऊपरी भाग में कुछ निर्माण अभी शेष है। पटमेश्वरी देवी के मंदिर को  इटियाथोक बाबागंज मार्ग से जोड़ने वाले स्थान पर एक विशालकाय प्रवेश द्वार भी बनवाया गया है । मंदिर में गर्भगृह के अंदर मां पटमेश्वरी देवी की पििंडी स्वरूप के साथ में मां दुर्गा, मां काली, व माता लक्ष्मी सहित कई अन्य मूर्तियों की अस्थापना वेदांती जी के निर्देशन में 11 विद्ववान पंडितों के दल ने पूरे विधि विधान के साथ स्थापित कराया । गर्भ ग्रह में मूर्तियों की स्थापना के दौरान मुख्य यजमान के रूप में तत्कालीन विधायक नंदिता शुक्ला स्वयं मौजूद रहीं । मंदिर के साथ में शिव मंदिर, यज्ञ शाला तथा भव्य प्रवेश द्वार का निर्माण कराया गया है । 

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