गोण्डा। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के तत्वाधान में आशुतोष जी महाराज जी के शिष्य स्वामी अर्जुनानन्द जी एवं स्वामी विष्णु प्रकाशानन्द जी ने प्रेस वार्ता में बताया कि शंखनाद दिव्य भजन संध्या का संपूर्ण समाज को जगाने के लिये है। आज आध्यात्मिक रूप से रहा है। जब भोर होता है तो भारतीय सभ्यता में शंख ध्वनि किया जाता हे। युद्ध के मैदान में भी शत्रुओं को प्रावधान करने हेतु शंख ध्वनि किया जाता है। शुद्ध के मैदान में भी शत्रुओं को प्रावधान करने हेतु शंख ध्वनि किया जाता था। शंख की ध्वनि सुबह श्रवण करने से शारीरिक बीमारिया भी समाप्त होती है। अध्यात्मिक रूप से भी यह अनहद का प्रतीक है। यह भजन संध्या का उद्देश्य समाज में व्याप्त कुरितियों को समाप्त करके समाज के अध्यात्मिक वातावरण बनाना है। भक्ति धर्म को लेकर अनेक प्रश्न एवं संशय समाज में है। धर्म केवल धंधा बनकर रह गया है। धर्म धन्धा नही दिखावा नही बल्कि धर्म भगवान को अन्तर से जानने का माध्यम है। स्वामी ने कहा कि जब हम पूर्ण गुरू की कृपा से इस मानव शरीर में ही उस परमात्मा का दर्शन करेंगे तो वास्तव में धार्मिक कहलायेंगे। आज समाज को ढोंग एवं पाखण्ड की आवश्यकता नहीं है बल्कि विशुद्ध अध्यात्म की आवश्यकता है। समाज में आध्यात्मिक सुधार केवल पूर्ण संत सतगुरू ही लेकर आ सकते है। पूर्ण संत है बाहर का आडम्बर एवं पाखण्ड नही फैलाते हे, बल्कि वह वेद शास्त्रों के आधार पर वह ब्रह्मज्ञान प्रदान करते हे। सभी वेदों में सन्यास धर्म की चर्चा की गई है। सन्यासी वस्त्र से नही चरित्र से होता है। सच्चा गुरू केवल भगवान की चर्चा नहीं करता है बल्कि, दिव्य नेत्र खोलकर परमात्मा के प्रकाश का दर्शन करा देते है। आसुतोष महाराज जी केवल परमात्मा की चर्चा नहीं करते, बल्कि ईश्वर का दर्शन भी कराते हे। भजन संध्या की शुरूवात गणेश वन्दना एवं समापन आरती से हुआ। मंचासीन मुख्य वक्ता सांध्वी आध्या भारती जी ने अपने उदबोधन से धर्म का संदेश दिया।


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