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गोण्डा:हुजूर! यहाँ तो सुविधा शुल्क देकर चारागाह की जमीन पर होती है खेती


गोण्डा। जनपद मुख्यालय से गोण्डा उतरौला मार्ग पर लगभग 23 किमी दूर मुजेहना विकास खण्ड के ग्राम पंचायत रूद्रगढ़नौसी के राजस्व ग्राम रूद्रगढ़ में स्थित ग्राम पशु चारागाह का। यह चारागाह लगभग सात आठ सौ बीघे में फैला हुआ है जिसके बीचो-बीच एक लिंक रोड पक्की सड़क गुजरी है इसे चकबन्दी के समय विभाग ने एलाट किया था जो अब सिमटकर लगभग तीन चैथाई हो गया है। उसका सबसे बड़ा कारण रहा चारागाह से सटे खेतिहर किसानों का अतिक्रमण! यह अतिक्रमण ऐसा नही कि किसानों ने चुपचाप कर लिया बाकायदा कमोवेश हर साल लेखपाल तक किसी न किसी ग्रामीण की शिकायत पहुंचती है लेखपाल महोदय आकर नपाई करते हैं एकाध किसान की खेत नापते हैं फिर वापस चले आतें हैं। अब लेखपाल साहब को मनाने का खेल शुरू होता है। लेखपाल साहब के मानने पर सारे लोग दो फसल बोते है। तीसरे फसल पर फिर वही नपाई मान मनौव्वल यह नाटक देखते ही बनता है। इस मान मनौव्वल के बाद लेखपाल साहब खुश होकर क्षेत्र में तैनाती तक अभय वरदान दे देते हैं कि खूब अतिक्रमण करो बशर्ते समय समय पर मनाते रहो हद तो तब हो गयी कि कुछ दिनों पहले एक लेखपाल साहब ने बाकायदा चार-पांच लाख रूपये में इस चारागाह का सौदा भी कर लिया इसकी भनक कहीं सें जिलाधिकारी के संज्ञान मे आते ही उन्होने इस भ्रष्ट लेखपाल को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया  समझ में तब नहीं आता जब ये लेखपाल चुप रहते है। क्यों नहीं चेतावनी देकर मुकदमा लिखाते आखिर मुकदमा न लिखाने के पीछे क्या खेल रहता है।  जब कि इस चारागाह में लगभग 10 किमी की परिधि में लोंगों द्वारा छोड़े गये छुट्टा बछड़े गायें सांड़ लगभग सैकड़ों की संख्या में अपना ठिकाना बना जीवन आबाद रखते हैं। इन पशुओं की सुविधा हेतु कुछ साल पहले सरकार ने पौधारोपण कराया था लेकिन इन भूमाफिया ने सोची समझी चाल की .सारे पेड़ धीरे धीरे रातों रात कतिपय कुल्हाड़ी के शिकार होके कटते गये।  इस चारागाह के बीचो-बीच सड़क मार्ग निकलना ही इस चारागाह के लिए अभिशाप बन गया है।  वह चाहे भूमाफिया हो चाहे कोई व्यापारी कोई फैक्ट्री लगाने के लिए कोई डेयरी कोई कांजी हाउस कोई गऊशाला चलाने वाला किसी को इस पुनीत कार्य के लिए चारागाह रूपी कीमती जमीन ही सिद्ध दिखाई देती है। अन्य किसी जगह पर पुण्य नही मिलेगा। अरे भई सड़क गुजरी है जमीन कीमती है तो जमीन हथियाने के लिए कोई न कोई बहाना कोई न कोई जुगाड़ तो लगाना पड़ेगा। यहां खेल सिर्फ चारागाह का नही है अब सवाल यह उठता है कि इन ग्रामीणों को क्षेत्रीय लेखपाल ने समय रहते क्यों नही मना किया यह एक यक्ष प्रश्न है जो लोगों के जेहन में खटकती रहती है। यदि शासन प्रशासन का ध्यान आकृष्ट न हुआ तो वह दिन दूर नही जब इन लेखपाल से आम जन-मानस का विश्वास उठ जायेगा और ऐसे न जाने कितने चारागाह अपना आस्तित्व खोकर बन्दोबस्ती के पन्नों में सिमट कर रह जायेंगे।
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