डॉ ओपी भारती
गोण्डा (वजीरगंज):-वजीरगंज क्षेत्र के शिवाला स्थित गौरेश्वर नाथ मंदिर में चल रही संगीतमयी श्रीराम कथा में काशी धाम से आए प्रसिद्ध कथा व्यास संत गणेश जी महाराज ने शिव-पार्वती विवाह का वर्णन भोले शिव के श्रृंगार से लेकर माता पार्वती के विदाई तक की कथा बड़े ही मनमोहक और अलंकृत अंदाज़ में कही।
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| कथा कहते संत गणेश जी महाराज |
सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा।
जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा॥
कुंडल कंकन पहिरे ब्याला।
तन बिभूति पट केहरि छाला।।
ससि ललाट सुंदर सिर गंगा।
नयन तीनि उपबीत भुजंगा॥
गरल कंठ उर नर सिर माला।
असिव बेष सिवधाम कृपाला।।
शिवजी के गण शिवजी को दूल्हा बनाने के लिए श्रृंगार करने लगे। जटाओं का मुकुट बनाकर उस पर साँपों का मौर सजाया गया। शिवजी ने साँपों के ही कुंडल और कंकण पहने, शरीर पर विभूति रमायी और वस्त्र की जगह बाघम्बर लपेट लिया। शिवजी के सुंदर मस्तक पर चन्द्रमा, सिर पर गंगाजी, तीन नेत्र, साँपों का जनेऊ, गले में विष और छाती पर नरमुण्डों की माला थी। बड़ा ही बिहंगम दृश्य भोले के बारातियों का।देवता गण भी इस अभूतपूर्व बारात के बाराती बनने को लालायित है।
लगे सँवारन सकल सुर बाहन बिबिध बिमान।
होहिं सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा गान॥
सब देवता अपने भाँति-भाँति के वाहन और विमान सजाने लगे, कल्याणप्रद मंगल शकुन होने लगे और अप्सराएँ गाने लगीं।
जस दूलहु तसि बनी बराता।
कौतुक बिबिध होहिं मग जाता।।
कोउ मुख हीन विपुल मुख काहू।
बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू।।
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| शिव पार्वती विवाह का मनमोहक दृश्य |
अजीबो - गरीब बारात थी। देवताओं के साथ शिवजी के गण भी बराती है। जैसा दूल्हा वैसे बाराती है। किसी के मुख ही नही तो किसी के कई कई मुख है। किसी के आंख नही तो किसी के कई कई आंखे। ऐसा डरावना दृश्य के बच्चे दर के मारे भाग कर घरो में छिप गए। शिव की भगिनी चण्डी, भूत-प्रेत, पिशाच, वेताल, ब्रह्मराक्षस, गंधर्व, किन्नर आदि समस्त रुद्रसेना बाराती के रूप में हिमालयपुरी में प्रवेश कर चुकी है। बारातियों के आने की सूचना जब माता मैना तक पहुँची तो उन्होंने पर्वत राज हिमांचल से कहा कि गिरिजा के होने वाले पति को पहले मैं देखूंगी। भगवान शिव महारानी मेना के भीतर के अहंकार को जान गए और उन्होंने अद्भुत लीला की।भगवान शिव स्वयं जितने अद्भुत थे उनके बाराती भी उतने ही निराले थे। शंकरजी के विकट वेष को देखकर स्त्रियां भयभीत हो गयीं। परछन छोड़ सब भाग खड़ी हुई।
राजा हिमाचल के घर में प्रलय मच गया। शिव के स्वरूप को देखकर महारानी मेना मूर्छित होकर गिर पड़ी। फिर सचेत होकर नारद को कोसने लगी।पार्वती को भी खरी खोटी सुनाई, पार्वती! तेरी बुद्धि को धिक्कार है, तुझे धिक्कार है। तूने गिरिराज के इस कुल का उपहास करा दिया।’
महारानी मेना के शिव-पार्वती विवाह के विरुद्ध होने से वरपक्ष के भी छक्के छूट गए। तब नारदजी ने राजा हिमाचल के महल में जाकर पार्वती के पूर्वजन्म की कथा सुनाकर और शिव के साथ उनका सनातन सम्बन्ध बताकर सभी का भ्रम दूर कर दिया।स्वयं भगवान विष्णु द्वारा समझाए जाने पर महारानी मेना इस शर्त पर राजी हुईं कि शिव इस अमंगल वेष को त्यागकर सुन्दर वेष में मेरी पुत्री से विवाह के लिए आएं तभी मैं अपनी पुत्री उन्हें दूंगी। भगवान शिव ने माता मैना के अनुरोध को स्वीकार किया। सज संवर कर दुल्हे के भेष में आये, तब जाकर महारानी मेना की सारी चिन्ता व शोक दूर हो गए और उन्होंने अपने पहले अक्षम्य व्यवहार के लिए शिवजी से क्षमा मांगी। इस प्रकार विचित्र दूल्हे का अपनी नित्यसंगिनी से संयोग हुआ। गणेश जी महाराज ने शिव-पार्वतीजी के विवाह कथा में भगवान शिव के भयानक एवं सौम्य दोनों ही रूपो का बड़ा ही सजीव वर्णन किया। कथा के दौरान भगवान शिव के विवाह की मनमोहक झाँकी निकाली गई। शिव विवाह के समय क्षेत्र की माताओ, बहनों ने पाँव पूजन भी किया।स्वयं गणेश जी महाराज ने भी पांव पूजन किया। कथा के अंत मे उपस्थित श्रद्धालुओं में प्रसाद वितरण किया गया।




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