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प्रमुख चुनाव पर स्टे याचिका डिस्मिस होने से फिर तेज हुई चुनावी सरगर्मी


शिवेश शुक्ला 
 प्रतापगढ़। सुप्रीम कोर्ट से लालगंज ब्लाक के प्रमुख पद चुनाव को लेकर रोक लगाने की याचिका पूरी तरह डिस्मिस हो जाने के बाद अब फिर से बीडीसी सदस्यों को अपने पाले मे लेने की मंगलवार से चहल कदमी तेज हो उठी दिखी। वहीं तहसील से लेकर ब्लाक मुख्यालय तक सर्वोच्च न्यायालय के याचिका को पूरी तरह से खारिज करने को लेकर भी सियासी चर्चा का माहौल गर्म देखा गया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की छायाप्रति देखने से लोगों मे चुनाव को लेकर अब किसी तरह के झंझावात की गुंजाईश नही देखी जा रही है। कोर्ट ने न केवल याचिका खारिज कर दी। बल्कि अपने आदेश मे चुनाव से जुडे सभी प्रार्थना पत्रों का भी निस्तारण कर दिया। इस आदेश के बाद जहां अविश्वास प्रस्ताव के जरिये हटाये गये भाजपा समर्थित पूर्व प्रमुख रमेश प्रताप सिंह की लाबी को मात्र दो दिनों के भीतर ही करारा सियासी झटका महसूस हुआ है। वहीं अविश्वास प्रस्ताव लाकर रमेश को पदच्युत करने वाले सुरेंद्र सिंह समर्थकों का उत्साह दो गुना बढ़ आया है। रमेश प्रताप सिंह के अविश्वास प्रस्ताव ले आने के भ्रमित स्थागनादेश के बाद जिस तरह से ब्लाक पहुंचकर प्रमुख के नाम का सियासी शो किया गया। इसकी भी लोगों मे खूब मसकरी उड रही है। सुरेंद्र लाॅबी इसलिये भी ज्यादा उत्साह मे है कि अब मतदान एवं मतगणना के परिणाम को लेकर भी विपक्षी खेमा अनायास अदालत का समय जाया नहीं कर सकेगा। बीडीसी सदस्यों के साथ आम आवाम मे भी यह चर्चा फैली हुई है कि अब दो चार दिनो मे ही आयोग और जिला प्रशासन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत प्रमुख पद के चुनाव की घोषणा करेगा। स्थगनादेश की आड़ मे चुनाव रोकवाने के हथकण्डे को लेकर ज्यादातर बीडीसी सदस्य अंदर ही अंदर रमेश प्रताप सिंह की लाबी से असंतुष्ट भी हो उठे है। इन सदस्यो का मानना है कि रमेश गु्रप को यदि हम पर (बीडीसी) पर विश्वास होता तो वह मतदान मे रोड़ा न उत्पन्न कराते। वहीं अब चुनाव को एक मात्र विकल्प मानकर रमेश प्रताप सिंह और कांग्रेस समर्थित सुरेंद्र सिंह की पूरी लाबी चुनाव परिणाम को अपने पक्ष मे करने के लिये बीडीसी सदस्यों के घर दस्तक फिर देने लगी है। आम आवाम मे एक चर्चा यह भी है कि कुछ अन्य जिलों के साथ रिट मे स्टे हासिल कर रमेश प्रताप लाबी को शायद यह नहीं मालूम होगा कि सियासत के माहिर प्रमोद तिवारी एवं क्षेत्रीय विधायक आराधना मिश्रा मोना कुछ राजनीतिक गतिविधियों के कारण इधर दिल्ली मे ही मौजूद है। प्रमोद तिवारी एवं आराधना मिश्रा मोना ने सुप्रीम कोर्ट के स्टे मे खामियों को तुरंत ही पकड़ लिया और अगली नियत तिथि पर अदालत के सामने दूध का दूध पानी का पानी ला खड़ा कर दिया। लालगंज मे अविश्वास प्रस्ताव पारित हो चुके है और निर्वाचन आयोग की ओर से चुनाव की प्रक्रिया जारी है। इस बात की जानकारी होते ही सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी याचिका सिरे से खारिज कर दिया। फिलहाल अब कब चुनाव की तिथि घोषित होगी। इसे लेकर यहां का सियासी तापमान प्रमुख पद की आड़ मे फिर बढ़ गया दिखने लगा है। 

याचिका खारिज होने को लेकर आम आवाम के बीच सवाल व जबाब की बढ़ी चर्चा
 ब्लाक प्रमुख के चुनाव को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने अविश्वास प्रस्ताव को लेकर स्थगन याचिका जहां खारिज कर दी। वहीं सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कानून के जानकारों समेत जनसामान्य मे कई सवाल तैरने लगे है। जिस स्थगन आदेश का भ्रम फैलाकर कुर्सी गंवा बैठे रमेश प्रताप सिंह ने बीडीओ की कुर्सी पर बिना सोचे समझे कब्जा जमाने की जल्दबाजी की। वह निर्वाचन आयोग की नजर चढ़ी तो खुद प्रमुख पद के चुनाव मे नामंाकन कर प्रत्याशी की स्थिति मे क्या उन्हें आचार संहिता के उल्लंघन के दायरे मे भी खड़ा होना पड़ सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने जहां अविश्वास प्रस्ताव आ रहा था वहां पर रोक लगाई लेकिन आदेश को स्वभ्रमित कर पूर्व प्रमुख रमेश प्रताप सिंह ने जिस तरह जीत के दावे पेश किये, आम आवाम के बीच माला पहनकर ताजपोशी का स्वांग रचा और पटाखे छुड़वाये वह भी प्रशासन तक को नागवार गुजरा। मजबूरन सीओ को जिला प्रशासन के आदेश पर प्रमुख के कमरे को बंद कराना पड़ा। यही नहीं सर्वोच्च न्यायालय मे भी हाईकोर्ट मे मामला विचाराधीन होने का जिक्र नहीं किया। कानून के जानकार बतातें है कि भला हो सुप्रीम कोर्ट का जिसने इस मामले मे हाईकास्ट का जुर्माना नहीं ठोंका। वर्ना याचिका दाखिल करने के लेने के देने पड़ जाते। वहीं सबसे बड़ा सवाल कि यहां प्रमुख पद पर उपचुनाव की निर्वाचन आयोग द्वारा प्रक्रिया जारी होने के बावजूद याचिका मे आयोग को पक्षकार न बनाना भी एक बड़ी अदालत को झांसे मे रखने के भी दुस्साहस का परिणाम गंभीर हो सकता था। फिलहाल रमेश प्रताप सिंह की तो याचिका थी लोगों मे चर्चा इस बात की है कि तीसेर उम्मीदवार को आखिर क्या हो गया था कि वह तो मात्र नामांकन करने की ही स्थिति मे माला पहनकर अपने अजीब शो को प्रस्तुत कर जगहंसाई के मोहरे बन बैठे। और तो और लोगो मे इस बात का कौतूहल कुछ ज्यादा ही है कि एक पूर्व प्रमुख जिनका नाम ही निर्वाचन आयोग की गाइड लाइन पर वोटर लिस्ट से साफ हो गया कि आखिर उनकी मति कैसे कुंद सी हो गयी कि वह भी और उसी बाजार मे जहां हाल ही मे उन्हें अभी जनता की ओर से करारी हार झेलनी पड़ी। वह भी मालाधारियों की झुंड मे आगे आगे दौड़ लगा रहे थे। 

तो साठ सदस्यीय बीडीसी लिखेगें प्रमुख का भाग्य
 प्रमुख पद के उपचुनाव मे अदालती तस्वीर साफ होने के बाद अब केवल साठ सदस्यीय मतदाता मंडल ही नये प्रमुख का भाग्य लिखेगा। गौरतलब है कि लालगंज टाउन एरिया बनने के बाद एक दर्जन बीडीसी सदस्य भौगोलिक स्थिति मे परिवर्तन होने के कारण बीडीसी निर्वाचक मंडल के सदस्यता की अनर्हता खो चुके है। हालांकि इनमे से कुछ सदस्य जरूर न्यायालय मे अपनी सदस्यता बचाने के लिये फरियादियों की कतार मे देखे सुनें जा रहे है। 

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