गोंडा: बानगढ़ देवी मंदिर इन दिनों आस्था व विश्वास का केंद्र बिंदु बना हुआ है पौराणिक मान्यताओं के अनुसार त्रेता युग में जब दशरथ नंदन श्री राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न चारों भाई धनुर्विद्या सीख रहे थे और पारंगत होने पर गुरु वशिष्ठ ने राम से चारों दिशाओं में वाण फेंकने को कहा तो राम ने अपने तरखस से एक-एक कर चारों दिशाओं में चार वाण फेंके सभी तीन दिशाओं से वाण वापस आ गया किंतु उत्तर दिशा की ओर फेंका गया वाण वापस नहीं लौटा जब उस वाण की खोज की गई तो पता चला कि वह वाण नीम के पेड़ से टकराकर पाताल को चला गया और वहीं पर पिंडी के रूप में देवी प्रकट हुई जिन्हें कालांतर में श्री बानगढ़ देवी के रूप में जाना गया।
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आज यही स्थान मनकापुर नगर के बीचो-बीच श्री बानगढ़ देवी के रूप के नाम से जाना जाता है वर्ष भर यहां मुंडन, नामकरण, कथा भागवत, विवाह ,यगोपवित्र जैसे संस्कार होते हैं नवरात्र के मौके पर यहां विशेष आयोजन होते हैं मां बानगढ़ देवी की पूजा अर्चना प्रतिदिन भक्तगण दूर दूर से आकर करते हैं देवी मां भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं ।




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