वासुदेव यादव
अयोध्या। फैज़ाबाद, श्री रामनगरी के विभीषण कुण्ड माेहल्ले में स्थित प्राचीन कूर्मनारायण नेपाली मन्दिर में भगवान कूर्मनारायण का तीन दिवसीय वार्षिकाेत्सव समारोह धूमधाम से मनाया गया, जिससे पूरा मन्दिर परिसर भक्तिभाव से आप्लावित रहा।
इसी क्रम में आखिरी दिन रविवार काे प्रात:काल मन्दिर में विराजमान कच्छप आकार के कूर्म नारायण भगवान का पंचामृत और सुगन्धित औषधियों से विधि-विधान पूर्वक भव्य अभिषेक किया गया। तदुपरांत भगवान का श्रृंगार कर आरती की गई। महाेत्सव में ताेताद्रिमठ पीठाधीश्वर स्वामी अनन्ताचार्य महाराज, चन्द्र हरि मन्दिर के महन्त स्वामी कृष्ण कान्ताचार्य, स्वामी भरताचार्य, स्वामी रघुनाथ देशिक, स्वामी श्री निवासाचार्य, स्वामी कृष्णामाचार्य, आनन्द दास आदि सन्त-महन्त माैजूद रहे।
इस माैके पर मन्दिर के महन्त स्वामी हरि प्रपन्नाचार्य जी महाराज ने कहा कि यह महाेत्सव प्रतिवर्ष वैशाख शुक्ल त्रयाेदशी से प्रारम्भ हाेकर वैशाख शुक्ल पूर्णिमा काे समाप्त हाेता है। उसी के अनुसार इस बार 27 अप्रैल शुक्रवार काे समाराेह का शुभारम्भ हुआ, जिसके क्रम में प्रथम दिवस दीप, कलश, विष्वकसेन पूजन, भगवत्त समाराधन, वेद, पुराण स्त्राेत आदि का पारायण। द्वितीय दिवस सुबह आवाहित देव समाराधन, पारायण तथा सायंकाल नृसिंह भगवान का प्राकट्याेत्सव मनाया गया। महाेत्सव के अन्तिम दिन वैशाख शुक्ल पूर्णिमा रविवार काे श्री कूर्म नारायण भगवान का महाभिषेक व श्रृंगार आरती के बाद समापन। उन्हाेंने कहा कि नेपाली मन्दिर में विराजमान कूर्म नारायण भगवान मुक्ति नाथ क्षेत्र में स्वयं व्यक्त विशाल शालिग्राम हैं, जिनमें नेत्र, ललाट, मस्तक नासिका, मुखार विन्द आदि कूर्माकृति के चिन्ह स्पष्ट रूप से अंकित हैं। दूर से दर्शन करते समय मानव निर्मित मूर्ति के रूप में दिखाई देने वाले कूर्मा कृति के शालिग्राम भगवान साक्षात नारायण स्वरूप हैं। श्री महन्त ने कहाकि लगभग 125 वर्ष पूर्व की बात है नेपाल के मुक्ति क्षेत्र में काली गण्डकी नदी के किनारे रहने वाले कुछ व्यक्तियाें ने एक रात वहां ज्याेति पुंज देखा। ज्याेति पुंज का स्थान सुनिश्चित करने के लिए वे लाेग वहां पर कुछ चिन्ह रखकर घर लौटे। दूसरे दिन सवेरा हाेने पर उस स्थान पर गए। ताे वहां कच्छप रूप के 15 इंच डायमीटर का एक विशाल शालिग्राम देखकर आश्चर्य चकित हाे गये। एेसा अपूर्व शालिग्राम अवश्य ही बहुमूल्य हाेगा तथा किसी सम्पन्न आस्तिक व्यक्ति को दिए जाने पर काफी धन मिलेगा। एेसी आशा व धारणा के साथ वे लाेग काठ माण्डू पहुंचे। जब बबरजंग राणा की धर्मपत्नी भक्तिमती राजकुमारी देवी काे इस बारे में पता चला। ताे उन्होंने उन लाेगाें काे आदर पूर्वक अपने घर बुलवाया और शालिग्राम भगवान काे देखकर प्रेममग्न हाे गयीं। जिसे घर पर ही विराजमान कराकर पूजा करने की इच्छा व्यक्त किया। शालिग्राम काे पण्डिताें और ज्याेतिषीयाें काे दिखाया गया। उन लाेगाें ने उक्त शालिग्राम काे अत्यंत दुर्लभ व कूर्मनारायण भगवान स्वरूप बताया। राजपुराेहित व पण्डिताें से विशाल मूर्ति का घर पर पूजा करने का विधान नही है एेसा ज्ञात हाेने पर राजकुमारी देवी का मन बहुत दुखी हुआ। उन्होंने दुखी मन से शालिग्राम काे वापस ले जाने की आज्ञा दी। तत्पश्चात एक अनाेखी घटना घटी शालिग्राम लाने वाले व्यक्ति ने जब उसे वापस ले जाने की काेशिश किया। तब वह शालिग्राम काे उठा न सका। उस दिन शालिग्राम वहीं रखा रहा। स्वामी हरिप्रपन्नाचार्य ने कहाकि उसी रात राजकुमारी काे सपने में भगवान ने उसी शालिग्राम काे भारत की पुण्य भूमि अयाेध्या नगरी में एक मन्दिर निर्माण करवाकर उसमें स्थापना करके पूजा करने की आज्ञा दी। एेसा वंशानुगत स्राेत से ज्ञात हाेता है। उक्त स्वप्न से प्रेरित हाेकर कुछ समय पश्चात राजकुमारी देवी अयाेध्या पहुंची और विभीषण कुण्ड नामक स्थान पर पण्डित माेदनाथ शर्मा के प्रबन्धकत्व में एक विशाल मन्दिर का निर्माण करवाया। उसी स्थान पर उनकी सुपुत्री ने विभीषण कुण्ड का भव्य रूप से पुनर्निर्माण कराया। कुछ समय पश्चात राजकुमारी देवी ने उक्त मन्दिर काे वानमामलै रामानुज जीयर स्वामी काे समर्पित कर संचालन की जिम्मेदारी पण्डित माेदनाथ शर्मा तथा उनके परिवार काे पीढ़ी दर पीढ़ी साैंप दिया। राजकुमारी देवी का सन् 1940 में कूर्मनारायण भगवान का नित्य दर्शन करते हुए वैकुण्ठवास हाे गया।


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