मोजीम खान
सिंहपुर,अमेठी-जल ही जीवन है और बिन जल के जीवन संभव नहीं है।जल एक ऐसी कुदरत की दी हुयी नियामत है जिसके बिना कोई भी जीव जन्तु जीवित नहीं रह सकता है।इस समय पूरी दुनिया में जल का संकट मंडरा रहा है और कहा जाता भी जा रहा है कि अगला विश्वयुद्ध जल को लेकर हो सकता है।यहीं कारण है कि पूरी दुनिया जल संरक्षण के लिये लोगों को जागरूक करने के लिये हर साल 23 मार्च को जल संरक्षण दिवस मनाकर लोगों को जल संरक्षण के प्रति जागरूक कर रहा है।जल हमें प्रकृति प्रदान करती है और धरती के अंदर के जल स्रोत हमें स्वच्छ निर्मल जल प्रदान करते हैं।इस समय जल का दोहन इतनी तेजी से हो रहा है कि नदियाँ कुँआ तालाब झील सभी सूखने लगी है।धरती का जलस्तर तेजी से नीचे जा रहा है जिसके फलस्वरूप कम गहराई वाले हैन्डपम्प एवं नलकूप की बोरिगें फेल होने लगी है।अब तक माना जाता था कि पानी मोल नहीं बिकता है बल्कि यह ईश्वर प्रदत्त है और लोग पानी पिलाना अपना धर्म मानते थे किन्तु अब पानी की बिक्री होने लगी है।जल के बिना धरती पर न तो हरियाली रह सकती है और न ही किसानी हो सकती है।अब तक जलस्तर ठीक रखने का काम तालाब व झीलें आदि करती थी किन्तु समय के साथ साथ वह खत्म होते जा रहे हैं।सरकार भी करोड़ों अरबों रूपये गाँवों में तालाब खुदवाने के नाम पर खर्च कर चुकी है किन्तु तकनीकी अनुभव के अभाव में वह लक्ष्यपूर्ति नहीं कर पा रहे हैं।जो तालाब गाँवों में खुदवाये गये हैं वह जल ग्रहण नहीं कर पा रहे हैं और वह साल बारहों महीने सूखेे पड़े रहते है जो पानी आसमान से बरसता है उतना ही उसमें जा पाता है।बरसात भी इधर होना कम हो गयी है और इतना पानी बरसता भी नहीं है कि जो तालाब को भर सके और तालाब तक पानी का बहाव पहुँचकर खुद बंदिशों को तोड़ सके।आधुनिकता के दौरान में कुएँ पट गये हैं और उनकी जगह इन्डिया मार्का हैंडपम्पों ने ले लिया है।आजकल इन हैडपम्पो में समरसेबुल लगने लगें हैं। बड़ी बड़ी फैक्टरियों कल कारखानों संस्थानों को कहे जो दैनिक जरूरी कार्य अबतक दस बाल्टी में हो जाते थे वह अब दस ड्रम कौन कहे दस बड़ी टंकी में होने लगा है।जो स्नान अबतक एक दो बाल्टी से हो जाता था वह अब दस बाल्टी से होने लगा है।जल का दुरुपयोग एवं जल का दोहन जल के भविष्य के लिये खतरा बनता जा रहा है।जल संरक्षण की हमारी परम्परा ही समाप्त होती जा रही है लोग भूल रहे हैं कि जल को देवता और जीव की जान कहा जाता है।बरसात हमारे पर्यावरण से जुड़ी होती है और जब पर्यावरण प्रदूषित होता है तो जलवायु परिवर्तन ही नहीं बल्कि जीवन पर संकट के बादल मंडराने लगते है।पर्यावरण प्रदूषण बढ़ गया है। पर्यावरण संरक्षण की उतनी ही जरूरत है जितनी मनुष्य को जिंदा रहने के लिये सांसों की होती है।बिना खाये तो पानी पीकर जिंदा रहा जा सकता है लेकिन बिना पानी खाना खाकर जिंदा नहीं रहा जा सकता है।कहा भी गया है कि-" रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून पानी गये न उबरै मोती मानुष चून ।गहराते जल संकट से लोग परेशान हो रहे है।इतना ही नही जंगली जीव जन्तु प्यास से तड़पने को मजबूर है।यह समास्या हर जगह बन चुकी है।प्यास की वजह से जंगली जीव जन्तु मरे जा रहे है।गर्मी का प्रकोप लगातार बढ़ रहा है।गर्मी से उत्पन्न होने वाली अनेक समास्याए मुँह बाऐ सामने खड़ी है।
"बाग एवं अपने छतों पर बर्तन के किसी पार्ट मे रखे पानी"
पानी की वजह से किसी जानवर की जान न जाये इसके लिये सभी लोग अपने अपने छतों और बागो मे बर्तन की किसी पार्ट मे पानी रखे दे।जिससे किसी जानवर की जिंदगी पानी की वजह से न जाये।आप सब का यह एक प्रयास किसी की भी जिंदगी बचा सकती है



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