खुर्शीद खान
सुल्तानपुर। "ज्ञान कर्म और योग के अलग-अलग अधिकारी या पात्र हो सकते हैं किंतु भक्ति पर सबका अधिकार होता है उसके लिए कोई विशिष्ट आवश्यक नहीं होती है इसलिए भक्ति सर्वश्रेष्ठ है भागवत धर्म के अनुसार मनसा वाचा कर्मणा में भाग्य दर्पण करने के पश्चात ही उसकी शक्ति प्राप्त होती है।" यह विचार चतुश्लोकी भागवत ज्ञान यज्ञ के छठवें दिन कानपुर के प्रमुख आचार्य पूज्य स्वामी गगेशानंद ने व्यक्त किया।
सुल्तानपुर के नगर स्थित पंडित रामनरेश त्रिपाठी सभागार में नगर वासियों ने बढ़ चढ़कर श्रद्धा पूर्वक ज्ञान यज्ञ का परागण किया। नगर के गणमान्य नागरिकों के मध्य स्वामी ने चतुश्लोकी भागवत के सामवेद पाठ से अपना प्रवचन प्रारंभ किया भागवत की कथा के रस सागर में गोते लगाने का सबसे बड़ा आनंद है कि इसके शरण में अनेक अवांतर ज्ञान की कथाओं का श्रवण का आनंद मिलता है यह बोधकथाएं हमें कल का साक्षात्कार या आत्म बोध कराने में बहुत सहायक होती हैं और दूसरे गंभीर तत्व विचार सरलता पूर्वक हृदय में होता है स्वामी जी ने महर्षि भरत के द्वारा दिए गए उत्तरों से आज के प्रवचन का आरंभ किया महाराज रघु के द्वारा दिए गए प्रश्नों के उत्तर में महाराज भरत ने बताया कि हमें तत्व विचार और व्यवहार के भेद को समझना चाहिए तत्व विचार के समय तत्व विचार का प्रसंग उचित नहीं है क्योंकि विश्वात्मक मन की गति संसार की ओर होती है और अनासक्त मन की शक्ति परमात्मा की ओर होती है जगत का छात्रवृति ज्ञान के मिथ्यात्व से प्रमाणित होता है हमारी द्वितीय शक्तियों का अहंकार ग्रहण करती हैं और चेतना हमें हरित विस्मृत प्रकाशित कराती है अतः स्मृतियों के विरोध से जो मीठा है विष्णु का निरोध हो जाता है क्योंकि कृपया अनुरूप होने के कारण विधि मिश्रा है यही जगत का महत्व है हम मन की शक्तियों के कारण भ्रमित होते हैं अतः ज्ञान के स्वर पर मिश्रा प्रमाणित होता है आत्मा और मन और मृत्यु का विषय नहीं वह सब समय था सब समय है और सब समय रहेगा नाराज से वासुदेव और देवकी के द्वारिका में मिलन के संदर्भ में स्वामी ने कहा सूर्य और चंद्र वंश की उत्पत्ति राजा निमि की चलो चल भक्ति देवलोक भूलो व अन्य लोगों में समय की गति व अनुराग अंतराल के प्रसंगों को विस्तार से स्पष्ट किया गया अर्चना भक्ति में से पल विश्रांत की प्राप्ति होती है ऐसी चला सकती भगवत कृपा से ही प्राप्त होती है इसलिए मनुष्य की शर्म विश्रांति है। इस प्रसंग में स्वामी जी ने बताया कि ज्ञान कर्म और योग के अलग-अलग अधिकारी या पात्र हो सकते हैं किंतु भक्ति पर सबका अधिकार होता है उसके लिए कोई विशिष्ट आवश्यक नहीं होती है इसलिए भक्ति सर्वश्रेष्ठ है भागवत धर्म के अनुसार मनसा वाचा कर्मणा में भाग्य दर्पण करने के पश्चात ही उसकी शक्ति प्राप्त होती है। भगवान कृपा जो पहले से ही सब के लिए विद्यमान है वह भगवत दर्पण के पश्चात अनुभव में आने लगती है भागवत धर्म के अनुसार हमें अपने सभी कर्मों को भगवान को अर्पित कर देना चाहिए यही भागवत धर्म का मूल उद्देश्य भागवत कथा का संचालन श्री अरविंद सोसाइटी के संयोजक डॉक्टर जे पी सिंह के दिशा निर्देशन में हुआ प्रमुख रुप से डॉ संजय शर्मा डॉ कुलदीप पांडे डॉ आशीष डॉक्टर ए के अग्रवाल डॉक्टर पवन सिंह डॉक्टर बी बी सिंह जय प्रकाश सिंह अजय सिंह सहित सैकड़ों लोग उपस्थित रहे।

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