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पूर्वी उत्तर प्रदेश में गन्ने की मिठास में राजनीति की कड़वाहट










गन्ना किसानों से किए गए वादे पर खरे नहीं उतरे मोदी - योगी
अक्टूबर के बाद 29 दिसंबर निर्धारित की गई थी बकाया भुगतान की तिथि
 पुराने भुगतान के लाले, चालू पेराई सत्र के भुगतान पर भी पेंच

ए.आर.उस्मानी
गोण्डा। 'सारा जिस्म ही घायल था घाव ऐसा था, मगर कोई न देख सका रखरखाव ऐसा था।' यह दर्द है सूूबे के उन किसानों का जो गन्ने की खेती पर निर्भर हैं, जिनके घरों में अच्छे दिन तब आते हैं, जब उनके बैंक खाते में गन्ना भुगतान की रकम आती है। तमाम किसानों के घर शादियां, खुशियां और जिंदगी की कई जरूरी सहूलियतें गन्ने पर ही निर्भर होती हैं। बहरहाल, अब मीठे गन्ने पर भी राजनीति की कड़वाहट कुछ इस कदर भारी पड़ने लगी है कि खेतों में उगने वाले मीठे गन्ने पर बहस अब ट्वीटर पर होने लगी है, जिसमें तमाम दल चुनावी लाभ के लिए कूद पड़े हैं।







   
आजादी के पहले से ही उत्तर प्रदेश की प्रमुख नकदी फसल गन्ना ही थी। ब्रिटिश काल में भारत की दूसरी चीनी मिल देवरिया जिले के प्रतापपुर में ही लगी थी। बावजूद इसके आज प्रदेश के मुखिया योगी आदित्यनाथ अगर किसानों को गन्ना न बोने की सलाह देते हैं, तो यह बात गले से नहीं उतरती। सूबे की योगी सरकार सबका साथ, सबका विकास के दावे और वादे भी करती है, लेकिन उत्तर प्रदेश के गन्ना किसान अब परेशान हैं क्योंकि ना तो उन्हें चीनी मिलों से पिछला भुगतान ही हो रहा है और न सरकार की तरफ से कोई फौरी राहत ही दी जा रही है। जहां एक तरफ योगी सरकार गन्ना किसानों का भुगतान अक्टूबर के बाद अब दिसंबर तक करने की बात कह रही है, वहीं गन्ना किसानों का कहना है कि अभी तक ना तो चीनी मिलों द्वारा और ना सरकार द्वारा ही कोई ऐसी ठोस पहल की गई है, जिससे उनका बकाया भुगतान तत्काल उन्हें मिल पाए।







 बताते चलें कि सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ ने पिछले माह सोनभद्र में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा था कि प्रदेश के किसानों को अब गन्ना बोने के बजाय सब्जियों की तरफ ध्यान केंद्रित करना चाहिए, क्योंकि गन्ने से मधुमेह की बीमारी होती है। उनका यह बयान किसानों के जख्मों पर नमक सरीखा है, क्योंकि उत्तर प्रदेश के लगभग आधे किसान गन्ने की खेती कर अपना और अपने पूरे परिवार का गुजारा करते हैं। हम सभी ने स्कूल की किताबों में प्रदेश की मुख्य फसलों के बारे में पढ़ा है, तो उसमें मुख्य दो फसलों का जिक्र आता है कि उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा गन्ना और धान की पैदावार होती है।







 कभी उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक चीनी मिलों का ज़ाल हुआ करता था, जिसमें सरकारी चीनी मिलों के साथ ही बिरला, बजाज, डालमिया जैसे बड़े उद्योगपति उत्तर प्रदेश में चीनी मिल लगाने के लिए लालायित रहते थे, लेकिन 2000 के दशक के बाद हुए कई राजनीतिक बदलाव ने इन सरकारी और गैर सरकारी चीनी मिलों की दुर्गति शुरू कर दी। जानकार मानते हैं कि मायावती के शासनकाल में कुछ सरकारी चीनी मिलों की खरीद-फरोख्त का घोटाला भी सामने आया जिसमें मायावती ने सरकारी चीनी मिलों को सस्ते दामों पर बेच दिया था। इसके बाद की सरकारों ने भी सरकारी और प्राइवेट चीनी मिलों की ना तो कोई सुध ली और न ही उनकी बेहतरी के लिए कोई ठोस और कारगर कदम उठाए। आज स्थिति यह है कि गन्ना बोने वाला किसान गन्ने की पर्ची को पाने की ज़द्दोज़हद से लेकर गन्ना कांंटा सेंटर पर तौलाई तक सिर्फ जुगाड़ और सिस्टम के भरोसे ही चल रहा है।






 गन्ने की घटतौली से लेकर बकाया भुगतान तक की दुश्वारियों में फंसा आम किसान अब किस बूते पर सब्जियों की खेती करे ? पिछले ही साल योगी सरकार में ही आलू उत्पादक किसानों ने टनों आलू राजधानी के विधान भवन के सामने डाल कर अपनी हालत को सरकार तक पहुंचाने की कोशिश की थी। आलू की पैदावार उत्तर प्रदेश में पहले से ही बहुत अच्छी होती आई है। इसके बावजूद आलू उत्पादक किसानों को न तो उसका सही रेट मिलता है और न ही सरकार की तरफ से कोई सुविधा मुहैया कराई जाती है। इन सबके बीच में अगर सारा फायदा देखा जाए तो सिर्फ और सिर्फ बिचौलिए ही उठाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों के हाथ में तो शायद लागत मूल्य भी नहीं आता।








 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के दौरान पूर्वांचल की रैैैलियों में गन्ना किसानों से खासतौर से वादा किया था कि उत्तर प्रदेश में सरकार बनने पर गन्ना किसानों के अच्छे दिन आयेंगे और उनको चीनी मिल मालिकों से शीघ्र अतिशीघ्र बकाया दिलाएंगे, लेकिन सरकार बनने के बाद वे अपना वादा भूल गए। गन्ने की पूरी राम कहानी के पीछे की असली वजह तलाशने पर राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो मौजूदा सरकार अपनी घोषणाओं और प्रदेश की खस्ताहाल आर्थिक स्थिति में संतुलन बिठाने के लिए ही मीठे गन्ने से मोहभंग का प्रदर्शन कर रही है।





 चुनावी साल में लगातार विकास का दबाव और निजी चीनी मिलों द्वारा चुनाव के समय नफा-नुकसान के आधार पर स्थानीय स्तर पर समीकरणों में शामिल होने की वजह भी इससे अछूती नहीं है। बहरहाल इन सबके बीच गन्ना किसान अपनी पुख्ता पहचान बनाने के लिए सरकार से लेकर मिल मालिकों तक पर आश्रित सा लग रहा है। कहीं गन्ने पर मची रार चुनावी साल में कोई गुल ना खिला दे.? यह देखना मौजू होगा।



बेहतरी के लिए कल्याण सिंह ने उठाया था ठोस कदम : हनुमंत सिंह

90 के दशक में कल्याण सिंह सरकार में गन्ना और चीनी मंत्री रहे हनुमन्त सिंह बताते हैं कि उनके कार्यकाल में प्रदेश में गन्ना शोध संस्थानों की स्थापना की गयी थी, जिससे गन्ने की उन्नत प्रजाति और पैदावार बढ़ाने में मदद मिलती, लेकिन कल्याण सिंह की सरकार राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद मामले में बर्खास्त कर दी गयी। 





इसके बाद आयी सरकारों ने इस योजना की सुध ही नहीं ली। हनुमन्त सिंह बताते हैं कि तब उत्तर प्रदेश में बिरला, नारंग जैसे घरानों की चीनी मिलें हुआ करती थीं। वे बताते हैं कि श्रद्धेय अटल जी भी कई मौकों पर चीनी मिलों और किसानों को लेकर बेहतर काम के लिए प्रोत्साहित करते रहते थे। कई बार अटल जी स्वयं चीनी मिलों और किसानों की बेहतरी के लिए उन्हें दिल्ली बुलाकर किसानों के गन्ना उत्पादन के विकास के लिए अपने महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे।
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