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GONDA:गैंगरेप पीड़िता आत्महत्या प्रकरण : एएसपी से लेकर डीआईजी तक जिम्मेदार






जवाबदेही से दामन बचा रहे आला अधिकारी
सीएम ने भी शिकायत पर बरती नरमी
भ्रष्ट और बेलगाम गोण्डा पुलिस से उठ रहा आम आदमी का भरोसा






ए. आर. उस्मानी
गोण्डा। सूबे के सीएम और डीजीपी के सख्त फरमान के बाद भी जिले में आम आदमी के लिए न्याय शब्द जटिल और बेमानी है। यहां पुलिस महकमे में भ्रष्टाचार का घुन इस कदर लग चुका है कि उसने व्यवस्था को ही लुंजपुंज कर दिया है। 




सोमवार को एक गैंगरेप पीड़ित महिला ने खाकी की न्याय प्रणाली से हताश और निराश होकर जो आत्मघाती कदम उठाया, उसने सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है। पड़ताल में जो खुलासा हुआ है, उससे अपर पुलिस अधीक्षक से लेकर डीआईजी जैसे आला अधिकारी की भी लचर कार्यशैली पर सवाल उठ रहा है। यह बात दीगर है कि ये अपनी जिम्मेदारियों और जवाबदेही से बचते हुए मातहतों पर लापरवाही का चाबुक चला दिए, लेकिन सवाल अब भी जस का तस है।
     



जिले की करनैलगंज कोतवाली क्षेत्र के ग्राम फतेहपुर कोटहना की करीब 35 वर्षीया अनीता पाठक पत्नी आनंद कुमार पाठक ने 7 अगस्त 2018 को कोतवाली करनैलगंज में गैंगरेप, धमकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के अंतर्गत मुकदमा पंजीकृत कराया था, जिसमें कहा गया था कि उसके पति आनंद कुमार पाठक रोजी रोटी के लिए हरियाणा के रोहतक  में रहते हैं।





 गांव के ही श्याम कुमार उर्फ बुधई व शंकर दयाल उर्फ बल्लू पुत्रगण गंगाराम ने मिलकर खुद को तांत्रिक विद्या का जानकार बताया तथा कहा कि उसका पति किसी दूसरी महिला के जाल में फंसा हुआ है। दोनों ने उससे पीछा छुड़ाने के लिए तांत्रिक विद्या का इस्तेमाल करते हुए अनीता को ब्लैकमेल किया। हद तो तब हो गई जब 7 फरवरी 2018 को उसके साथ दोनों ने बलात्कार किया। 




इतना ही नहीं, आरोप है कि दोनों ने बलात्कार का वीडियो भी बना लिया और उसे सोशल मीडिया पर वायरल करने की धमकी देते हुए उसके साथ जबरन लगातार बलात्कार करते रहे। 7 अगस्त 2018 को उसने कोतवाली में दोनों आरोपियों के विरुद्ध गैंगरेप, धमकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी के अंतर्गत मुकदमा पंजीकृत कराया, जिसकी विवेचना करनैलगंज कोतवाली के इंस्पेक्टर अजीत प्रताप सिंह को सौंपी गयी। 




अजीत प्रताप सिंह का कहना है कि साक्ष्य के अभाव में मुकदमे की विवेचना कर उसमें फाइनल रिपोर्ट लगा दी गई। पुलिस द्वारा फाइनल रिपोर्ट लगाने के बाद महिला ने कुछ दिन पूर्व लखनऊ में मुख्यमंत्री आवास के सामने आत्मदाह करने का प्रयास किया। उसके बाद अधिकारियों ने मामले को गंभीरता से लेते हुए करनैलगंज पुलिस द्वारा लगाई गई फाइनल रिपोर्ट को दरकिनार कर इसकी विवेचना क्राइम ब्रांच द्वारा कराने के निर्देश दिए।





तत्कालीन पुलिस अधीक्षक लल्लन सिंह ने इसकी विवेचना क्राइम ब्रांच को सौंपी। इस प्रकरण में सबसे दुखद पहलू यह रहा कि क्राइम ब्रांच ने भी विवेचना कर मामले में फाइनल रिपोर्ट लगा दिया। इसके बाद अपर पुलिस अधीक्षक को जांंच सौंपी गयी। एएसपी जांच कर कार्रवाई करने के बजाय मामले को लटकाए रहे, जिससे रेप पीड़िता का भरोसा पुुलिस और न्याय प्रक्रिया से उठता गया।





 गैंगरेप के आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई न होने से पीड़िता में हताशा और निराशा बढ़ती गयी। आखिर में उसने जो आत्मघाती कदम उठाया, उससे रोंगटे खड़े हो गए और पुलिसिया कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह लग गया।
    


बताते चलें कि उच्चतम न्यायालय में आदेशानुसार जो पीड़िता धारा 164 का बयान देती है, उस पर मजिस्ट्रेट क्रास क्वीश्चन नहीं करता है, बल्कि कलमबंद लिखता है तथा उसके अतिरिक्त किसी अन्य साक्ष्य की आवश्यकता नहीं समझी जाती है। लेकिन इस मामले में विवेचक ने बयान को बिना संज्ञान लिए 164 के बयान को क्रास करके अंतिम रिपोर्ट प्रेषित कर दी।




 इतना ही नहीं, पीड़ित महिला द्वारा 18 गवाहों का शपथपत्र प्रभारी निरीक्षक के समक्ष दिया गया, जिसे रिसीव करने के बावजूद सम्मिलित नहीं किया गया। इस प्रकरण में 4 गवाहों का शपथपत्र पुलिस अधीक्षक के समक्ष प्रस्तुत किया गया। उसे भी सम्मिलित नहीं किया गया। पीड़िता ने कोतवाली से लेकर एसपी और डीआईजी तक का दरवाजा खटखटाया, लेकिन उसे कहीं से भी न्याय नहीं मिला। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तथा डीजीपी को भी गोण्डा पुलिस की लचर और भ्रष्ट कार्यशैली से अवगत कराते हुए न्याय की गुहार लगायी, लेकिन वहां से भी उसे निराश होना पड़ा।
      





सवाल यह उठता है कि कोतवाली पुलिस से न्याय न मिलने पर जब रेप पीड़िता ने पुलिस अधीक्षक का दरवाजा खटखटाया, तब उन्होंने इसे गंभीरता से क्यों नहीं लिया.? उन्होंने विवेचक की रिपोर्ट पर आंखें बंद करके क्यों भरोसा कर लिया? डीआईजी ने भी इस प्रकरण में महज खानापूर्ति की। क्या उनकी जवाबदेही नहीं बनती है.? 




यक्ष प्रश्न यह भी है कि विवेचक इंस्पेक्टर अजीत प्रताप सिंह व क्राइम ब्रांच के इंस्पेक्टर परमानंद तिवारी की फाइनल रिपोर्ट के बाद जब अपर पुलिस अधीक्षक हृदेश कुमार को विवेचना सौंपी गयी, तब वे तत्परता से निष्पक्ष जांच कर कार्रवाई करने के बजाय क्यों लटकाए रहे.? क्या ऐसे मामले में डीआईजी, पुलिस अधीक्षक व अपर पुलिस अधीक्षक जैसे आला अधिकारियों की जिम्मेदारी और जवाबदेही तय नहीं है.?




गैंगरेप पीड़ित महिला द्वारा सोमवार को आत्महत्या करने की घटना के बाद पुलिस अधीक्षक राकेश प्रकाश सिंह ने भले ही त्वरित कार्रवाई करते हुए विवेचक इंस्पेक्टर अजीत प्रताप सिंह व क्राइम ब्रांच के परमानंद तिवारी को निलंबित करने के साथ ही कोतवाल वेद प्रकाश श्रीवास्तव को लाइन हाजिर कर दिया, लेकिन पुलिस की कार्यशैली और भ्रष्ट सिस्टम को लेकर मीडिया तथा सोशल मीडिया पर उठाए जा रहे सवाल अब भी अनुत्तरित हैं।
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