सुनील उपाध्याय
बस्ती, 04 फरवरी 2019। बस्ती महुली मार्ग पर निपनिया स्थित रामजानकी मन्दिर पर श्रीशिव शक्ति पीठ शोध सेवा संस्थान की ओर से आयोजित रामकथा के दूसरे दिन अयोध्या से पधारे पण्डित अर्जुन शुक्ल ने सजी के चरित्र की विस्तार से व्याख्या की। कहा कि कथा के रसपान से समस्त व्याधियां दूर हो जाती है और मन के विकार मिट जाते हैं।
उन्होने शिव पार्वती विवाह पर प्रकाश डालते हुये कहा कि एक दिन अचानक देवर्षि नारद राजा हिमालय के महल में आ पहुँचे और पार्वती को देख कहने लगे कि इसका विवाह शंकरजी के साथ होना चाहिए और वे ही सभी दृष्टि से इसके योग्य हैं। पार्वती के माता-पिता के आनंद का यह जानकर ठिकाना न रहा कि साक्षात जगन्माता सती ही उनके यहाँ प्रकट हुई हैं। वे मन ही मन भाग्य को सराहने लगे। एक दिन अचानक भगवान शंकर सती के विरह में घूमते-घूमते उसी प्रदेश में जा पहुँचे और पास ही के स्थान गंगावतरण में तपस्या करने लगे। जब हिमालय को इसकी जानकारी मिली तो वे पार्वती को लेकर शिवजी के पास गए। वहाँ राजा ने शिवजी से विनम्रतापूर्वक अपनी पुत्री को सेवा में ग्रहण करने की प्रार्थना की। शिवजी ने पहले तो आनाकानी की, किंतु पार्वती की भक्ति देखकर वे उनका आग्रह न टाल न सके।
शिवजी से अनुमति मिलने के बाद तो पार्वती प्रतिदिन अपनी सखियों को साथ ले उनकी सेवा करने लगीं। किंतु पार्वती जैसी सुंदर बाला से इस प्रकार एकांत में सेवा लेते रहने पर भी शंकर के मन में कभी विकार नहीं हुआ। वे सदा अपनी समाधि में ही निश्चल रहते। सभी देवता शिव-पार्वती का विवाह कराने की चेष्टा करने लगे। उन्होंने शिव को पार्वती के प्रति अनुरक्त करने के लिए कामदेव को उनके पास भेजा, किंतु पुष्पायुध का पुष्पबाण भी शंकर के मन को विक्षुब्ध न कर सका। उलटा कामदेव उनकी क्रोधाग्नि से भस्म हो गए। इसके बाद शंकर कैलास की ओर चल दिए। पार्वती ंने निराश न होकर तप द्वारा शंकर को संतुष्ट करने की मन में ठानी।
अपने संकल्प से वे तनिक भी विचलित नहीं हुईं। वे भी घर से निकल उसी शिखर पर तपस्या करने लगीं, जहाँ शिवजी ने तपस्या की थी। तभी से लोग उस शिखर को ’गौरी-शिखर’ कहने लगे। वहाँ उन्होंने पहले वर्ष फलाहार से जीवन व्यतीत किया, दूसरे वर्ष वे पर्ण (वृक्षों के पत्ते) खाकर रहने लगीं और फिर तो उन्होंने पर्ण का भी त्याग कर दिया और इसीलिए वे ’अपर्णा’ कहलाईं। अंततः हिमाचल ने कन्यादान दिया। विष्णु भगवान तथा अन्यान्य देव और देव-रमणियों ने नाना प्रकार के उपहार भेंट किए। ब्रह्माजी ने वेदोक्त रीति से शंकर पार्वती का विवाह करवाया। चौरी चौरा से पधारे पण्डित हेमन्त शास्त्री ने अपने सम्बोधन से कथा को रोचक बनाया। कथा को सफल बनाने में मुख्य यजमान दयाशंकर, राजकुमारी, राम शोहरत, शान्ती व व्यवस्थापक बाबा महादेव दास सहित तमाम क्षेत्रीय जनो ने सहयोग प्रदान किया।


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