लखनऊ | गुरूकी महत्ता हमारे जीवन में अनुपम है क्योंकि गुरू के बिना हम जीवन का सार ही नहीं समझ सकते हैं। लेकिन हमेशा इस बात का सदैव ही ध्यान रखना चाहिए कि गुरू के समक्ष चंचलता नहीं करनी चाहिए और सदा ही अल्पवासी होना चाहिए। जितनी आवश्यकता है उतना ही बोलें और जितना अधिक हो सके गुरू की वाणी का श्रवण करें।
यह विचार आवाज के जादूगर पार्श्वगायक पंडित रवि त्रिपाठी के संयोजन में लखनऊ के अम्रपाली बिहार, रजनी खंड ,तेलीबाग में चल रही श्रीमदभागवत कथा के दूसरे दिन मनीषी वज्ररस मर्मज्ञाचार्य आचार्य अमर बिहारी जी महाराज ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि गुरू चरणों की सेवा का अवसर मिलना परम सौभाग्य होता है, जो अनमोल है।
मुझे भी ठाकुरजी की कृपा से गुरूसेवा का दायित्व मिला था, लेकिन उस समय सेवाभाव का ज्ञान नहीं था और अब जब ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी है तो गुरू सेवा का अवसर नहीं हैं। इसलिए गुरू सेवा को समर्पित भाव से करना और उनका आदेश का पालन सदा ही करना चाहिए। गुरू की महिमा अपार है और उनकी करूणा अदभुत है कब किस पर अनुग्रह हो जाएं। उन्होंने धार्मिक ग्रंथो में वर्णित अवतारों के बारे में विस्तृत प्रकाश डालते हुए कहा कि घर द्वार छोड़कर वन में चले जाने ही वैराग्य नहीं होता बल्कि अपने अंतःकरण की शुद्धता इसमें नितांत आवश्यक है।
हमारे जीवन में विचारों का आदान प्रदान रोम-रोम से होता है इसके लिए सिर्फ नाक, कान और आखें ही नहीं होती हैं। संत महात्मा की दृष्टि को दिव्य बताते हुए कहा गया कि हम उतना ही देख सकते हैं जितनी दूर तक हमारी दृष्टि जाती है, लेकिन संत जन अनंत तक देखने की दृष्टि रखते हैं। कथा में मुख्य यजमान के रूप में श्री कृष्ण त्रिपाठी श्रीमती सुमित्रा त्रिपाठी जी है |


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