आलोक बर्नवाल
संतकबीरनगर। सरकार द्वारा सभी ग्राम पंचायतो में मिनी सचिवालय के रूप में पंचायत भवन का निर्माण कराने व उसमें नियमित अधिकारियों को बैठने का निर्देश है। जिसे ग्राम पंचायत के निवासियों को किसी भी सरकारी कागज के लिए भागदौड़ न करनी पड़े। लेकिन जिम्मेदारों की उदासीनता के चलते इन आदेशों को दरकिनार कर दिया गया। जनपद की अधिकतर ग्राम पंचायतों में मिनी सचिवालय का निर्माण तो हुआ, लेकिन उसमें से अधिकतर में या तो ताले लटकते मिलेंगे या फिर अवैध कब्जे में। ऐसा ही मामला धनघटा तहसील के हैंसर विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत रामपुर दक्षिणी का है। जहां तीन कमरों व एक मीटिंग हॉल का निर्माण तो ग्राम पंचायत द्वारा करा दिया गया। लेकिन अपने निर्माण काल से ही वह अवैध कब्जा धारकों के कब्जे में है। ग्राम पंचायत द्वारा उसे खाली कराने की जहमत तक नहीं उठाई गयी। जब इस बारे में ग्राम प्रधान रमाकान्त से पूछा गया तो उन्होंने यह कहते हुए अपनी जिम्मेदारियों की इतिश्री कर ली गयी कि इनके पास मकान नहीं है, इसलिए इसमें रहते हैं। जबकि वर्तमान व पिछली सरकारों द्वारा हर ग्राम पंचायत में आवास दे कर लाभार्थियों को अपना घर प्रदान किया गया। नियमित बैठक के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा कि जब बैठक होती है तो हाल को खाली कराया जाता है। बड़ा सवाल यह है कि सरकार जनता की सुविधा के लिए भारी रकम राशि खर्च कर इन सचिवालयों का निर्माण कराया जाता है। साथ ही यह भी आदेश देती है कि ग्राम पंचायत अधिकारी, लेखपाल व ग्राम पंचायत की नियमित बैठक सचिवालय में कराई जाए। आम जनमानस एक कागज के टुकड़े के लिए ब्लॉक मुख्यालय से लेकर जनपद मुख्यालय भले ही दौड़े। ऐसा ही मामला हैंसर ब्लॉक के ग्राम पंचायत रामपुर दक्षिणी का है,जहां मिनी सचिवालय का निर्माण तो करा दिया गया। लेकिन निर्माण वर्ष से लेकर अब तक वह अवैध कब्जा धारक के कब्जे में है,और कागजों में संपन्न हो रही है ग्राम पंचायत की बैठके। जबकि सरकार का सख्त आदेश है कि मिनी सचिवालय सभी सुविधाओं से लैस हो। संबंधित अधिकारी बराबर वहां बैठे। जिससे आम जनमानस को सुविधा पूर्वक योजनाओं का लाभ मिल सके। लेकिन यहां यहां तो जिम्मेदारों को सिर्फ सरकारी धन के बंदरबांट की लालसा है। जिसके चलते मिनी सचिवालय तो अवैध कब्जा धारक के कब्जे में है वहीं ग्रामीणों को ढूंढने से भी नहीं मिलते अधिकारी। आखिर कैसे सफल हो सरकार की योजनाएं यह एक बड़ा सवाल.?

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