सुनील उपाध्याय
बस्ती।श्राद्ध कर्म की पूजा अनादिकाल से चली आ रही है। शास्त्रों में पितृ देवो भवः की संज्ञा दी गई है ,अर्थात पितृ देवता के समान हैं उनकी पूजा करनी चाहिए। पितृपक्षे पितरों को श्राद्ध तर्पण कर पितरों से आशीर्वाद सुख समृद्धि तथा पितृ दोष व पितृ ऋण से मुक्ति पाने का अवसर मिलता है। पितरों के प्रति श्रद्धा भाव ही श्राद्ध है। उक्त बातें श्री शिव शक्ति पीठ शोध एवं सेवा संस्थान के संस्थापक बाबा महादेव दास ने निपनिया चौराहे पर स्थित राम जानकी मंदिर पर कहीं। उन्होंने कहा राम चरित मानस के अनुसार गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा एक बार भूपति मन माहीं,भई गलानि मोरे सुत नाही ।। अर्थात एक बार राजा दशरथ अपने पितरों को जल अर्पण कर रहे थे तभी उनकी आंखों सेआंसू गिरने लगे मन मे अपार कष्ट हुआ। पितरों ने पूछा हे दशरथ क्यो दुखित हो दशरथ ने कहा मैने पितरों को जल अर्पण किया और सोचने लगा मेरे बाद यह कर्म कौन करेगा मेरे पुत्र नहीं है,इसी से मन द्रवित हो गया मुझे कौन जल देगा ।आज के बदलते परिवेश में घरों में पितरों के प्रति अज्ञानता वश अनादर का माहौल बनाने लगा है । उसका कारण है अपनी अपनी संस्कृति से विरक्त होना ।जो अनुचित है,पित्तर दोष के कारण पारिवारिक समस्या,वंश अवरोध, संतान सुख, धनाभाव आदि जैसी समस्याओं का श्राद्ध कर निजात पाया जा सकता है। यही हमारा धर्म है और वैदिक परम्परा भी।


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