आलोक बर्नवाल
संतकबीरनगर। दीप उत्सव का त्यौहार दीपावली बड़ी ही धूमधाम से लोगों ने अपने अपने तरीके से मनाया और जनपद मुख्यालय सहित देहात क्षेत्रों में भी देर रात तक लोगों ने आतिशबाजी की आतिशबाजी ने लोगों के जेब ढीले किए और शहर को प्रदूषण युक्त बना डाला हालात ऐसे हैं की शहर में चारों तरफ दुआ ही दुआ दिख रहा है बुजुर्ग और बच्चों को सांस लेने में काफी दिक्कतें हो रही हैं तो वहीं पर्यावरण को भी काफी हानि हुआ है।
दीवाली प्रदूषण की नहीं, प्रकाश के विजय का पर्व बने
यदि सरकार को सच में दीवाली पर होने वाले प्रदूषण की चिंता है तो उसके लिए दो उपाय विज्ञापन से कहीं ज्यादा असरदार हो सकते हैं। दीवाली के समय दो विरोधी महकमे एक साथ बेहद सक्रिय हो जाते हैं। एक आतिशबाजी उद्योग दूसरा प्रदूषण विभाग। दीवाली से ठीक पहले अखबारों और टीवी पर सरकारी विज्ञापनों की भरमार होती है। इनका संदेश का मजमून यही होता है कि आतिशबाजी न करें और शहर को प्रदूषण मुक्त बनाए रखें। आतिशबाजी से सिर्फ धुआं नहीं निकलता उससे खुशी, उमंग, त्यौहार के होने का अहसास भी फूटता है। बच्चे से लेकर बूढ़ों तक ऐसा कोई नहीं, रंगीन आतिशबाजी जिसका मन न मोह लेती हो। सांस लेना कितना भी दूभर हो जाए, जोश, उमंग और त्यौहार के नशे में पर्यावरण के खराब होने की चिंता कहां सांस ले पाती है.? ऐसी चीज को छोड़ना कितना ज्यादा निरुत्साही है जो उत्साह और खुशी से भर देती हो। अगर पटाखे जलाने ही नहीं तो वे बने ही क्यों हैं.? वे बिक क्यों रहें हैं.? क्या आतिशबाजी उद्योग अरबों रुपये लगाकर पटाखे इसलिए बनाता है कि कोई उन्हें न खरीेदे.? सरकारी विज्ञापनों को देखकर यह सवाल सहज ही मन में आता है कि अगर पटाखे जलाने ही नहीं तो वे बने ही क्यों हैं.? वे बिक क्यों रहें हैं.? क्या आतिशबाजी उद्योग अरबों रुपये लगाकर पटाखे इसलिए बनाता है कि कोई उन्हें न खरीेदे.? जिन चीजों के प्रयोग पर पाबंदी के लिए सरकार को इतनी मशक्कत करनी पड़े, इतने विज्ञापन देने पड़ें, उनके उत्पादन की अनुमति ही वह क्यों दे रही है.? बीड़ी, सिरगेट, शराब, गुटखा के साथ पटाखे भी ऐसी चीज हैं जिनके उत्पादन पर कोई रोक नहीं, लेकिन जिनका प्रयोग न करने को लेकर सरकार बेहद सचेत दिखने का प्रयास करती है! यह विरोधाभास क्यों? पर्यावरण की चिंता करते बड़े संजीदा विज्ञापन आ रहे हैं. 'सभी पटाखा निर्माताओं और थोक विक्रेताओं एवं खुदरा विक्रेताओं के लिए ऐसे विज्ञापनों की व्यावहारिकता पर ही संदेह होता है। इन विज्ञापनों से कई सवाल पैदा होते हैं। क्या पटाखा जलाने वाले उपभोक्ताओं के पास आवाज की तीव्रता नापने वाला ऐसा कोई यंत्र होता है,जिससे पटाखों की आवाज की तीव्रता मापी जा सके.? क्या उन्हें पटाखों के साथ आवाज की तीव्रता मापने वाला ये यंत्र भी खरीदना होगा.? जिस समय एक ही कालोनी में दुनिया भर के पटाखे ताबड़तोड़ चल रहे हों, उस समय क्या यह संभव है कि वह यंत्र आवाज की सही तीव्रता मापे.? क्या पटाखों पर लिखा होता है कि उसमें कितनी आवाज की तीव्रता वाले पटाखे हैं.? क्या आज तक निर्धारित की गई तीव्रता वाले से ज्यादा आवाज वाले पटाखे कभी जले ही नहीं हैं.? कान को बहरा करने वाले पटाखे हर साल जलते हैं, लेकिन कभी किसी को इसी कारण सजा हुई हो ऐसा नहीं सुना। जिस समय एक ही कालोनी में दुनिया भर के पटाखे ताबड़तोड़ चल रहे हों, उस समय क्या यह संभव है कि वह यंत्र आवाज की सही तीव्रता मापे? यदि सरकार को सच में पर्यावरण की चिंता है तो उसके लिए विज्ञापन से कहीं ज्यादा असरदार दो चीजें हो सकती हैं। एक तो पटाखा उद्योग को व्यवस्थित तरीके से बंद किया जाना चाहिए। वहां काम रहे लोगों को किसी दूसरे वैकल्पिक व्यवसाय में लगाया जाए, ताकि उनके लिए रोजगार की दिक्कत न हो। यह सोचना भी कितना बेवकूफी से भरा है कि बनाई गई चीजों का इस्तेमाल न किया जाए। थोक व्यापारी और दुकानदार पटाखे बेचेंगे नहीं, ग्राहक पटाखे खरीदेंगे नहीं, और बच्चे पटाखे जलाएंगे नहीं तो फिर पटाखों का निर्माण ही क्यों किया जा रहा है.? बनी बनाई चीज को इस्तेमाल न करने के विज्ञापन देना भयंकर बेवकूफी है, छलावा है खुद से भी और पर्यावरण से भी। ऐसा कौन सा उत्पाद है इस दुनिया में जो सिर्फ गोदामों में भरा रखने और एक्सपायर होने के लिए छोड़ दिया जाता हो.?
दूसरा ऐसे पटाखों की खोज की जाए जिससे पर्यावरण को कम से कम नुकसान हो। आज के समय में विज्ञान ने कितनी तरक्की कर ली है। एक से बढ़कर एक आविष्कार हो रहे हैं हर क्षेत्र में. सरकार को पटाखा निर्माताओं को कम धुआं और आवाज करने वाले 'एनवायरमेंट फ्रेंडली पटाखों' के आविष्कार के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। पटाखे बनते समय ही यह सतर्कता बरती जानी चाहिए कि उनमें से कम से कम जहरीली गैस निकले और उनसे होने वाला शोर न्यूनतम हो. अलग से एक-एक पटाखे के शोर की तीव्रता मापना असंभव है, इसलिए प्रत्येक पटाखे के कवर पर निश्चित तौर से यह लिखे जाने का प्रावधान होना चाहिए कि वह कितनी तीव्रता की आवाज वाला पटाखा है। लेकिन इन दोनों बातों को बेहद शुरू में ही सावधानी और सतर्कता से सुनिश्चित किया जा सकता है। आज के समय में विज्ञान ने कितनी तरक्की कर ली है। सरकार को पटाखा निर्माताओं को कम धुआं और आवाज करने वाले 'एनवायरमेंट फ्रेंडली पटाखों' के आविष्कार के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। इस देश की बहुत कम ही आबादी पटाखे जलाती है। देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी के सामने दो वक्त के खाने का ही सवाल इतना बड़ा है, कि उसके लिए पटाखे जलाना सपना है। लेकिन छोटे-बड़े शहरों में रहने वाले सभी बच्चों को एक सी जहरीली हवा में सांस लेना होता है। जिन्होंने एक भी पटाखा नहीं जलाया उन्हें भी और जिन्होंने ढेर सारे पटाखे जलाए उन्हें भी। यह बात भी बच्चोें को पटाखे जलाने को प्रोत्साहित करती है कि जब उनके बिना पटाखे जलाए भी पर्यावरण प्रदूषित हो ही रहा है तो फिर वे पटाखों के मजे से वंचित क्यों रहें ? और यह सवाल बेहद जायज है कि जो लोग अपना और अपने बच्चों का मन मारकर पर्यावरण के नाम पर पटाखे नहीं जलाते वे भी उतनी ही जहरीली हवा में सांस लेने को अभिशप्त हैं ! पटाखे न जलाने और पर्यावरण की चिंता करने वालों को अलग से कोई प्रोत्साहन भी नहीं मिलता। सरकार के पटाखे न जलाने के विज्ञापनों या कुछ मुठ्ठी भर परिवारों के पटाखे न जलाने से पर्यावरण की समस्या हल नहीं होने वाली। यदि सच में सरकार और पर्यावरण प्रेमी पर्यावरण को बचाना चाहते हैं तो उन्हें पटाखों के निर्माण और उनकी क्वालिटी पर पूरा ध्यान देने की जरूरत है न कि पटाखे जलने से रोकने पर। वरना दीवाली अंधकार पर प्रकाश की नहीं, बल्कि प्रकाश पर धुएं की विजय का ही त्यौहार बनी रहेगी।

एक टिप्पणी भेजें
0 टिप्पणियाँ