रिपोर्ट:सुहैल आलम
हजारों की संख्या में श्रोता मौजूद जिला पंचायत अध्यक्ष उषा सिंह रही मौजूद
बल्दीराय/सुल्तानपुर।मजरूह सुलतानपुरी बीसवीं सदी के उर्दू /हिंदी के मशहूर शायर जिनका जन्म दिवस आज बड़े धूमधाम से बल्दीराय तहसील क्षेत्र के सेंट जांस कॉन्वेंट स्कूल पारा गनापुर में एक शाम मजरुह सुलतानपुरी के नाम से मनाया गया । जिसमें देश के नामी गिरामी शायरों/ कवियों ने शिरकत की,मुख्य अतिथि पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के प्रतिनिधि प्रोफेसर अली मोहम्मद खान मुशायरे में शरीक़ हुए विशिष्ट अतिथि पूर्व डीजीपी रिजवान अहमद के साथ प्रोफेसर अली खान नें दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुंभारंम्भ किया मशहूर व मारूफ़ शायर डाक्टर माजिद देववंदी ने अपनी गजलों शेरों से मौजूद महफ़िल को खुशी से झुमा दिया "सच अगर बोल देतां महफिल में कितने चेहरे उतर गये होते।
वही विकास बौखल ने अपने चिर परिचत अंदाज में मौजूदा सरकार पर तंजिया किया "किसी खंजर से न तलवार से जोड़ा जाये,सारी दुनिया को प्यार से जोड़ा जाये,ऐ किसी सख्स को दोबारा न मिलने पाये, प्यार के रोग को आधार से जोड़ा जाये।
हिलाल बदायूँनी नें आशिकाना शेर पढ़कर महफ़िल में चार चांद लगा दिया "गमें फराग का मंजर भी दर्द देता है,तेरे वगैर बिस्तर भी दर्द देता है।,,
सफर हमारा है जुगनुओं की तरह तुम्हारे शहर में फिरते है पागलों की तरह गुले शबा फतेहपुरी नें दर्शकों से खूब तालियाँ बटोरीं।
मुशायरे की अध्यक्षता इसौली विधायक अबरार अहमद ने किया:-
रूखसार बलरामपुरी के शेरों शायरी ने महफिल मे चारचाँद कर दिया शायरों नें अपने अपने अंदाज से कविताएं पढ़ी मजरुह सुल्तानपुरी बेलफेयर सोसाइटी के चेयरमैन सैय्यद मुशीर अहमद ने मजरुह के जीवन प्रकाश डालते हुए कहा कि हिंदी फिल्मों के एक प्रसिद्ध गीतकार और प्रगति शील आंदोलन के उर्दू के सबसे बड़े शायरों में से एक थे ।इनका जन्म 1अक्टूबर सन 1919 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के निजामाबाद गांव में हुआ था ,। इनके वालिद यहीं पे पुलिस मे उप निरीक्षक थे ।इनके पुरखों की असल पुस्तैनी जमीन सुलतानपुर के गजेहड़ी गांव में थी ।मजरूह सुलतानपुरी के बचपन का असली नाम "असरार उल हसन खान" था ।मगर आज देश उन्हें "मजरूह सुलतानपुरी "के नाम से जानती है ।मजरूह जी के गुरु "जिगर मुरादाबादी "थे ,जिनके सहयोग से इन्होनें एक बुलन्द मुकाम हासिल किया ।ये बामपंथी विचारधारा के थे जिसके चलते इन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। सन 1965 में फ़िल्म दोस्ती के गीत "चाहूंगा में तुझे सांझ सवेरे ,के लिए इन्हें"फ़िल्म फेयर "अवार्ड से नवाजा गया । सन 1993 में इन्हें "दादा साहेब फाल्के"पुरस्कार से सम्मानित किया गया ।इनकी मृत्यु 24 मई सन 2000 की मुम्बई में हुई ।आज भी सुलतानपुर की अवाम अपने बेमिशाल शायर को नही भूल पा रही है ।शायद कभी भूल भी नही
पायेगी दुनिया सूफियान प्रतापगढ़ी नें देश की तरक्की , तमाम कौमी एकता में एकजहती का सबुत पेस किय एंव देश में अमन भाईचारा बना रहे गीत सुनाकर जिस्म में शुरूर पैदा कर दिया उन्होने अपने अंदाज़ में सरकार की मौजूदा व्यवस्था पर तंज कसा "अपने घर में इसे इज्ज़त से अदब से रखों,वह अगर माँ हैं तो गलियों में भटकतीं क्यों है। नज्मे हसन प्रतापगढ़ी नें अपनी कविताओं से श्रोताओं का मन मोह लिया। इस मौके पर डाक्टर नफीस अहमद,प्रधान श्रीपाल पासी, शिवम श्रीवास्तव, नन्हे प्रंधान, सुहेल आविद, एडवोकेट नफीस अहमद,जिला पंचायत अध्यक्ष प्रति निधि शिवकुमार सिंह, सुधा सिंह,वेद प्रताप सिंह, शमीम खान, डा० जहीर, तनवीर अहमद,राम चंदर यादव, अख्तर रजा,जुनैद,
कायर्क्रम का संचालन हिलाल बदायूँनी नें किया।
आयोजक एडवोकेट नफ़ीस अहमद ने श्रोताओं के आभार प्रकट किया।

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