अखिलेश्वर तिवारी
जनपद बलरामपुर के महान शिक्षाविद रसायन शास्त्री पूरे देश में अपने प्रतिभा का अमिट छाप छोड़ चुके चुके डॉ इंद्र मोहन पांडे का सर्गवास 85 वर्ष की उम्र में 26 अप्रैल 2026 को लंबी बीमारी क बाद हो गया । ऐसा माना जा रहा है कि उनके स्वर्गवास से शिक्षा जगत के एक युग का अंत हो गया है।
डॉ. इंद्र मोहन पाण्डेय का जन्म 8 जुलाई 1941 को उत्तर प्रदेश के बलरामपुर नगर के मोहल्ला टेढ़ी बाजार में स्वर्गीय बद्री नारायण पाण्डेय के घर हुआ था । उनके पिता बद्री नारायण पाण्डेय एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद् नगर प्रतिष्ठित एमपीपी इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य रहे। उन्हें भारत के राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन द्वारा उत्कृष्ट अध्यापक के रूप में सम्मानित किया गया था। डॉ. पाण्डेय की प्रारंभिक शिक्षा एमपीपी इंटर कॉलेज, बलरामपुर में हुई। तत्पश्चात उन्होंने उच्च शिक्षा पंडित दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, गोरखपुर से प्राप्त की। अपने शैक्षणिक जीवन की शुरुआत उन्होंने सेंट एंड्रयूज कॉलेज, गोरखपुर में रसायन विज्ञान के प्रोफेसर के रूप में की। उन्होंने अपने आदर्श एमएलकेपीजी कॉलेज के प्राचार्य डॉ. आदित्य कुमार चतुर्वेदी के मार्गदर्शन में एमएलके पीजी कॉलेज, बलरामपुर (जिसे “तराई का ऑक्सफोर्ड” भी कहा जाता है) में रसायन विज्ञान के प्रोफेसर के रूप में कार्यभार ग्रहण किया। यहाँ उन्होंने विभागाध्यक्ष के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1 जुलाई 1998 को उन्हें इसी महाविद्यालय का प्राचार्य नियुक्त किया गया। अपने प्राचार्य कार्यकाल के दौरान डॉ. पाण्डेय ने संस्थान को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उनके नेतृत्व में महाविद्यालय में शैक्षणिक गुणवत्ता, अनुशासन और विकास के नए आयाम स्थापित हुए। उन्होंने अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए 30 जून 2002 को सेवानिवृत्ति प्राप्त की। उनके मार्गदर्शन में अनेक छात्रों ने पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त कर देश के विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएँ दीं। सेवानिवृत्ति के पश्चात भी उनका शैक्षणिक और सामाजिक योगदान निरंतर जारी रहा। 16 जून 2008 से वे एमडीके बालिका इंटर कॉलेज, बलरामपुर में अध्यक्ष एवं प्रबंधक के रूप में कार्यरत रहे। उनके कुशल नेतृत्व में विद्यालय ने उल्लेखनीय प्रगति की और नगर में एक विशिष्ट पहचान बनाई। डॉ. पाण्डेय लगभग 18 वर्षों तक पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित सेवा समिति, बलरामपुर के प्रधान रहे। उनके निर्देशन में नगर के प्रमुख त्योहारों पर जनसेवा के कार्य, जैसे प्याऊ की व्यवस्था, निरंतर संपन्न होते रहे। वे सामाजिक सौहार्द और सेवा भावना के प्रतीक थे। व्यक्तित्व की दृष्टि से डॉ. पाण्डेय सादगी, अनुशासन और समर्पण के आदर्श थे। वे शिक्षा को केवल ज्ञानार्जन का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण का सशक्त साधन मानते थे। छात्रों के प्रति उनकी संवेदनशीलता और प्रेरणादायक व्यवहार उन्हें एक आदर्श शिक्षक बनाता था। वे सदैव विद्यार्थियों को नैतिक मूल्यों, अनुशासन और कठोर परिश्रम के लिए प्रेरित करते रहे। उनकी पारिवारिक विरासत भी शिक्षा और सेवा से जुड़ी हुई है। उनकी बहुएँ वंदना पाण्डेय एवं साधना पाण्डेय शिक्षा जगत में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। उनके पौत्र-पौत्रियां देश-विदेश एवं चिकित्सा क्षेत्र में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। डॉ. इंद्र मोहन पाण्डेय का जीवन शिक्षा, सेवा और नैतिक मूल्यों का एक उज्ज्वल उदाहरण है। उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।
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