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बढ़ता तापमान पर्यावरण के लिए बन रहा खतरा - अजहरुद्दीन

अखिलेश्वर तिवारी 
जनपद बलरामपुर सहित नेपाल से सटे समस्त तराई क्षेत्र में बढ़ता तापमान पर्यावरण संतुलन के लिए खतरा बनता जा रहा है । बढ़ते पर्यावरण संतुलन पर चिंता जाहिर करते हुए भूगोल शास्त्री डॉक्टर अजहरुद्दीन ने कुछ सुझाव भी दिए हैं ।

भूगोल शास्त्री डॉक्टर अजहरुद्दीन ने 4 जून को बताया कि विश्व पर्यावरण दिवस पर उत्तर प्रदेश राज्य के तराई जनपदों में बढ़ते तापमान के कारण पर्यावरण पर प्रभाव पड़ रहा है । उन्होंने बताया कि तराई क्षेत्र जो उत्तर प्रदेश के उत्तरी भाग खासकर नेपाल देश की सीमा से सटा हुआ है जो हिमालय से  निकलने वाली नदियां छोटी-छोटी धाराओं में बहकर भाभर मैदान से निकलकर दृश्य होती हैं और एक दलदली भूमि निर्मित करती हैं, जिसे तराई का मैदान कहा जाता है। यह क्षेत्र अपने समृद्ध जैव विविधता, घने जंगलों, आद्र भूमि और उपजाऊ मृदा के लिए जाना जाता है जो भारत के सबसे अधिक पर्यावरणीय पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में शुमार किया जाता है। अभी हाल ही के कुछ वर्षों में क्षेत्र में उच्च तापमान ( हीट वेव, लू ) के कारण पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है जिसे निम्न बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है। 

      जैव विविधता और वन्य जीवों पर प्रभाव-तराई क्षेत्र के इस क्षेत्र में दुधवा राष्ट्रीय उद्यान, किशनपुर, कतर्निया घाट और सुहेलवा जैसे घने वन्य जीव अभ्यारण स्थित है उच्च तापमान के कारण निर्जलीकरण या हीट स्ट्रोक की समस्या जीवन पर हो रही है। प्रवासी पक्षियों के आगमन में असमय परिवर्तन और उनकी संख्या में गिरावट देखा जाना, उच्च तापमान के कारण अधिकांश क्षेत्र में सुखे की स्थिति पैदा होना जिस कारण सरीसृप, उभयचर और किट समुदायों का विनाश होना, जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ जाना आदि शामिल है। 
        जल संसाधनों पर प्रभाव तराई क्षेत्र भूजल और सतही जल से समृद्ध है यहां नदियां छोटी-छोटी धाराओं में बह  कर सदानीरा जल तालाब और झीलों में मौजूद है। बढ़ते तापमान के कारण वाष्पीकरण तीव्र होता है जिस कारण नदियों और तालाबों का जलस्तर कम होने लगता है जिससे आद्र भूमि सूखने लगती है जहां प्रवासी पक्षियों जलीय जीवों का निवास होता है सिंचाई और पीये जल पर भी प्रभाव पड़ता है।
         कृषि भूमि उपयोग मृदा की गुणवत्ता में परिवर्तन उच्च तापमान होने के कारण प्रभावित होता है। फसल चक्र में परिवर्तन, मृदा में नमी की मात्रा में तेजी से गिरावट, फसलों के उत्पादन में परिवर्तन, फसलों पर कीटों और बीमारियों का प्रकोप उच्च तापमान के कारण परिवर्तन देखने को मिलता है। 
         स्थानीय मानवीय जीवन शैली पर प्रभाव मानव का स्वास्थ्य पर्यावरणीय संतुलन का अभिन्न अंग है अधिक तापमान या हीट वेव से डिहाईड्रेशन, लू लगना, डेंगू मलेरिया जैसी बीमारियां बढ़ती हैं। मानव समुदाय की दैनिक दिनचर्या प्रभावित होती है जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था तथा सेवाएं भी बाधित होती हैं। 
        जलवायु परिवर्तन का फीडबैक लूप आद्र भूमि सूखने से कार्बन सोखने की क्षमता कम हो जाती है। उच्च तापमान के कारण मिट्टी और वनस्पतियों से कार्बन डाई ऑक्साइड और मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसे अधिक मात्रा में वायुमंडल में छोड़ी जाती हैं जिससे क्षेत्र विशेष और अधिक गर्म हो जाता है। 
उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में बढ़ता तापमान केवल मौसमी परेशानी नहीं है, बल्कि यह एक संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र को खतरे में डाल रहा है। जल संकट, जैव विविधता की हानि, कृषि संकट, मृदा अपरदन, वनों का क्षरण आपस में जुड़े हुए हैं। इस समस्या से निपटने के लिए तत्काल वृक्षारोपण, बचे हुए जंगलों में मानवीय हस्तक्षेप  कम करना, भूमि संरक्षण, जल संचयन, पर्यावरण अनुकूल कृषि की आवश्यकता है। साथ ही स्थानीय लोगों को पर्यावरण संरक्षण के लिए जागरुक किए बिना यह समस्या हल नहीं हो सकती। तराई क्षेत्र को बचाने का अर्थ है क्षेत्र की पारिस्थितिक संतुलन और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाना है।

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