सृजन पीढ़ियों का है करता
संरचना का पाठ पढ़ाता ।
शिक्षक जग उपवन का माली
ज्ञानकोष है सदा बढ़ाता।।
त्यागी-तपसी है संन्यासी
चिन्तक महाविचारक ज्ञानी।
नहीं चाहता बदले में कुछ
स्वार्थरहित विद्या का दानी।।
आदिकाल से अबतक देखो
दुनिया में परिवर्तन भारी ।
गुरुदेवों ने दिया बहुत है
मंगल की है अब तैयारी ।।
ईश्वर से बढ़कर है शिक्षक
ज्योति जगत में वह फैलाता।
विश्व बनाया है ब्रह्मा ने
शिक्षक धरती स्वर्ग बनाता।।
तुम प्रकाश विस्तारक दाता
श्रेष्ठ तुम्हारा रूप महान ।
पूजन-वंदन-अभिनन्दन है
हे! गुरुवर भू के भगवान ।।
डॉ० दयाराम मौर्य ' रत्न '
प्रतापगढ़

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