गोण्डा। साहित्य, कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में मान्यता रही है कि रचना कर्म वाह्य ज्ञान से अधिक अर्न्तदृष्टि से प्रेरित होता है। 15वीं शताब्दी में उपजे कबीर दास के बाद यह मान्यता हिन्दी गजल क्षितिज के बेताज बादशाह राम नाथ सिंह ‘अदम गोंडवी‘ के ऊपर बिल्कुल सटीक बैठती है। 22 अक्टूबर 1947 को गोण्डा जिले के आटा परसपुर नामक छोटे से गांव में जन्मे अदम एक निम्न मध्य वर्गीय किसान रहे। यद्यपि उनकी शिक्षा का स्तर मात्र 5वीं तक ही रहा। इसके बावजूद कबीर परम्परा से जीवन की शुरुआत करने वाले अदम हिन्दी गजल जैसी महत्वपूर्ण विधा में समकालीन शीर्ष रचनाकारों में आते हैं।
अमीर खुसरो से शुरु हुई हिन्दी गजल की यात्रा को सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला‘, अंचल, बलबीर सिंह ‘रंग‘, शमशेर सिंह और बाद में दुष्यंत कुमार ने दर्द, मुहब्बत, माशूक और इश्क हकीकी तक सीमित गजल को समाज एवं मानवीय संवेदनाओं तक विस्तार दिया। दुष्यंत कुमार की परम्परा को आगे बढ़ाने का गुरुतर दायित्व निभाने वाले राम नाथ सिंह ‘अदम गोंडवी‘ का नाम हिन्दी साहित्य के लिए कोई अजाना नहीं है। वर्ष 1975 में आपातकाल की ज्यादतियों ने अदम को रचना कर्म में उतरने की प्रेरणा दी। इनकी पहली कविता ‘चमारों की गली‘ पहली बार दैनिक अमृत प्रभात में प्रकाशित हुई। जनवादी रचनाकार के रुप में पहचान बनाने वाले अदम की गजलों का संग्रह ‘धरती की सतह पर‘ 1987 में प्रकाशित हुआ। हिन्दी में अभिव्यक्ति की विविधता की कमी को अंगीकार करते हुए मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत रचनाओं के धनी ‘अदम‘ को भोपाल स्थित दुष्यंत कुमार पाण्डुलिपि संस्थान द्वारा ‘दुष्यंत पुरस्कार‘ से नवाजा गया। आज से 20 वर्ष पूर्व लखनऊ से प्रकाशित पत्रिका ‘पत्रकार सदन‘ ने अदम के रचना उत्सों की पड़ताल करते हुए उनका साक्षात्कार छापा था। उसका एक अंश जो आज भी प्रासंगिक है।
आपको काव्य रचना की प्रेरणा कहां से मिली?
गोस्वामी तुलसीदास की जन्म भूमि सूकर खेत मानी गई है। जाहिर है गोस्वामी जी की रचनाओं का प्रभाव पूरे क्षेत्र पर है। उनकी रचनाओं से से ही काव्य रचना की प्रेरणा मिली।
तुलसीदास की वैचारिक संरचना से हटकर गजल अभिव्यक्ति का विचार कहां से आया?
बहराइच जिले के कैसरगंज कस्बे के निकट सरयू तट वासी महंथ रघुनाथ दास अरबी, फारसी के विद्वान थे। उनके सम्पर्क और सानिध्य में गजल रचना की शुरुआत हुई और उन्होंने ही ‘अदम‘ नाम दिया।
हिन्दी कविता के क्षेत्र में कवि सम्मेलनों एवं मंचों की व्यवस्था है। साहित्य के विकास में में मंचों की क्या सार्थकता है?
आलोचक और महान कवि डा. राम विलास शर्मा और केदारनाथ अग्रवाल ने मंचों के कवियों को साहित्य से खारिज किया है। मेरी राय में यह विभाजन ठीक नहीं है। यदि मंच के कवियों द्वारालोकप्रियता के लिए कुद फार्मूलों (हास्य व्यंग) का प्रयोग किया जाता है,तो दूसरी ओर तथा कथित मुख्य धारा के रचनाकारों द्वारा भी जो लिखा जाता है उसे दपाया जाता है। जबकि उसमें बहुत कुछ अस्तरीय होता है।
पार्टी विचार धारा में विचार की प्रतिबद्धता हासिए पर है। साहित्य की दृष्टि से इसे कैसे रेखांकित करेंगे?
फिलहाल सारी प्रतिबद्धताएं हासिए पर हैं। शेरो-शायरी कोई ट्रेन नहीं है जो पटरी पर ही चले। साहित्य में दृष्टि महत्वपूर्ण है, प्रतिबद्धता नहीं।
साहित्यकार जिस परिवर्तन और राजनीतिक सोच की बात करता है उसका कोई अंश अपने निजी जीवन में नहीं उतारता। इसे आप किस रुप में ग्रहण करते हैं?
साहित्यकार किसी दूसरे ग्रह का निवासी नहीं है। वह भी इसी समाज में रहता है तो समाज के गुण-अवगुण से वह अछूता कैसे रह सकता है। वैसे भी साहित्यकार की अपनी सीमा है। वह साहित्य के अंदर अपनी पीड़ा व्यक्त कर सकता है, समाज में परिवर्तन की अपेक्षा स्वाभाविक है। कई रचनाकार सत्ता केनिकट रहे, सत्ता की बात बोलने लगे। वे सत्ता की भाषा अलग और रचना की भाषा अलग बोने लगे। इसका प्रभाव अवश्य पड़ा है। यहां मैं किसी का नाम नहीं लेना उचित नहीं समझता।
समकालीन राजनीति के समानान्तर साहित्य में भी राजनीति चल रही है। इस पर आप क्या कहेंगे?
राजनीतिक प्रदूषण का प्रभाव साहित्य में भी है। मुझे संपादकों, आलोचकों व साहित्यकारों की परवाह नहीं है। युवा वर्ग मुझे सम्मान देता है यही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
आपकी चर्चा दुष्यंत कुमार के साथ की जाती है। जबकि दुष्यंत कुमार ने रूमानी गजलें अधिक लिखी हैं और आपकी गजलों में रूमानियत है ही नहीं। बल्कि आपकी रचनाएं भारतीय समाज के कुद कटु यथार्थों को अभिकेन्द्रित करती हैं?
ऐसा नहीं है! प्रारंभ तो दुष्यंत कुमार ने ही किया था-‘कहां तो तय था चिरांगा हरेक घर के लिए, कहां चिरांगा मयस्सर नहीं शहर के लिए‘। हां यह जरुर है कि जो चिंतन दुष्यंत कुमार ने धंधला छोड़ दिया था। उसे मैंने साफ करने का प्रयास किया। मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि दुष्यंत कुमार के यहां कलात्मकता है और मेरे पास साफगोई। मैंने जो कुछ देखा, अनुभव किया उसे सीधे-सीधे कह दिया, सजाया संवारा नहीं।
साहित्य में विषय महत्वपूर्ण पक्ष है। एससे रचना की सोच का पता चलता है। आपकी गजलों में परिदृश्य के साथ-साथ सरल भाव और सहज शब्दावली का समावेश दिखता है?
मेरी गजलें मेरे व्यक्तिगत जीवन से जुड़ी हैं जैसे बरगद के ऊपर मेंने कविता लिखी। मैं ठेठ गांव का रहने वाला हूं तो बरगद जैसे विशाल व्यक्तित्व से जुड़ाव स्वाभाविक है। साहित्य में सारी चीजें चेतन अवस्था में ही नहीं घटित होतीं। कई अचेतन अवस्था में भी घटित होती हैं। बाबा के निधन के बाद दादी की पीड़ा को अचेतन मन से महसूस करता रहा और कुछ लिखने की प्रेरणा मिलने पर लिखा- ‘भूख के अहसास को शेरो सुखन तक ले चलो। या अदब को मुफलिसों के अंजुमन तक ले चलो।। जो गजल माशूक के जलवों से वाकिफ हो गई। उसे अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो।।
मेरी गजलों में परिवेश प्रधान तत्व है। एक आम आदमी अपनी भावना जिस प्रकार बोलचाल की सरल भाषा में व्यक्त करता है वही भाव, भाषा और सहज शब्दावली मेरे शायरी की पूंजी है। सहज भाव, सहज प्रवाह किसी भी भाषा का प्राण तत्व है। साहित्य के लिए कृत्रिम, गम्भीरऔर बोझिल शब्दावली कभी हितकर नहीं होगी। किसी भी युग में कालजयी रचनाएं उस युग की लोक भाषा के सरल शब्दों में ही लिखी गईं। इसका प्रमाण है कि कबीर, तुलसी और रसखान के साहित्य पर लोगोंके प्राण बसते हैं और केशव साहित्यिक प्राचीर में कैद होकर रह गए।
साहित्यिक और सांस्कृतिक क्षेत्र के भविष्य के बारे में आपके क्या विचार हैं?
आज हर जगह व्यावसायिकता हावी है। संवेदना हासिए पर पहुच गई है। इसका परिणाम रहा कि साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के पाठक नहीं हैं। आज के इस वैचारिक युग में वह सामग्री नहीं आ पा रही है जो हम चाहते हैं। इस समय महाकाव्य क्या खण्डकाव्य भी नहीं लिखे जा रहे। साहित्य के भविष्य का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है। मेरे विचार से समकालीन साहित्य में विचार व्यवस्थापित करने के लिए व्यापक फलक चाहिए।


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