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किसानो सावधान : हो सकती है आपकी उपजाऊ जमीन रेत


राकेश गिरी 
बस्ती  । केंद्र सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का संकल्प लिया है, लेकिन जिस तरह से बस्ती मंडल की उपजाऊ जमीन रेत में तब्दील होने लगी है, उससे पूर्वांचल के इस इलाके पर खेती-किसानी को लेकर संकट के बादल मंडराने लगे है, अगर इसी रफ्तार से कृषि भूमि का क्षरण होता रहा तो आने वाले सालों में इसे मरूस्थल में बदलने से रोकना मुश्किल होगा,क्षेत्रीय मृदा परीक्षण प्रयोगषाला की रिपोर्ट के मुताबिक बस्ती, संतकबीरनगर और सिद्वार्थनगर की खेती योग्य भूमि में आर्गेनिक कार्बन का स्तर एकदम से नीचले स्तर पर पहुंच गया है, रिपोर्ट के मुताबिक प्रति किलोग्राम मिट्टी में आर्गेनिक कार्बन 0.2 तक पहुंच गया है, जबकि इसका प्रतिषत 0.8 होना चाहिए , जिससे फसलें प्रभावित हो रही है और उत्पादन बढ़ाने के लिए किसान कैमिकल युक्त खाद का अंधाधुंध प्रयोग कर उपजाऊ भूमि का दोहन कर रहें हैं,अगर जल्द ही किसानों को जागरूक नही किया गया तो आने वाले कुछ वर्षों में खेती लायक भूमि पथरीली और रेतीली हो जाएंगी, इसके अलावा जिंक और सल्फर की मात्रा भी घट गई है, जिंक का स्तर मिट्टी में 1.20 पीपीएम होनी चाहिए, जबकि यह घटकर 0.5 पीपीएम तक पहुंच गई है, इसी तरह से सल्फर की मात्रा 15 पीपीएम होना चाहिए, लेकिन यह भी अपने सबसे नीचले स्तर 8 पीपीएम के आसपास है, मिट्टी में इन तत्वों की कमी की वजह से ही फसलों में पीलापन और रोग लग रहे हैं,मृदा परीक्षण प्रयोगषाला के अध्यक्ष अरविंद कुमार सिंह ने बताया कि मिट्टी की लगातार गिरती सेहत को देखते हुए अब विभाग के कर्मचारी खुद किसानों के खेतों में जाकर सैंपल कलेक्ट कर रहे हैं, जिसके लिए उन्हें हर सैंपल पर 15 रूपये प्रोत्साहन राषि दी जा रही है, उन्होंने बताया कि बस्ती मंडल के तीनों जिले बस्ती,संतकबीरनग और सिद्धार्थनगर में 2015-16 में 162314 किसानों के खेतों से सैम्पल लिया गया, वहीं 2016-17 में 212670 किसानों के खेत से मिट्टी के सैंपल लिए गए थे, प्रयोगषाला में इन सैंपलों की जांच के दौरान आर्गेनिक कार्बन, सल्फर और जिंक की बेहद कमी पाई गई, सोइल स्ट्रक्चर बुरी तरह से प्रभावित हुआ है, जिससे फसलों की पैदावार पर खतरा बढ़ गया है,अरविंद सिंह ने बताया की विश्व मृदा स्वास्थ्य दिवस से अभियान चलाकर किसानों को जागरूक किया जाएगा,किसान पाठषाला योजना के तहत हर न्याय पंचायत से दो पिछड़े गांवों का चयन कर किसानों को जागरूक किया जाएगा, इसके लिए उस गांव के किसानों को वहां की प्राइमरी स्कूल में शाम 4 से 5 बजे तक इस बारे में समझाया जाएगा, यह कार्याक्रम 5 दिसंबर से शुरू होकर 15 दिसंबर तक दो चरणों में चलेगा, बस्ती जिले में दो चरणों के लिए 202 गांवों का चयन किया गया है।

वहीं जिला कृषि अधिकारी सतीश पाठक का कहना है की किसान आज अंधाधुन रसायनों का प्रयोग कर रहे हैं, जिससे मिट्टी की सेहत बिगड़ रही है, और जो फसलों का उत्पादन हो रहा है,उस पर भी रसायनों का असर हो रहा है,जिसे खाने पर रसायन इंसान के अंदर जा रहे हैं,और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं, किसानों को अपनी मिट्टी की जांच करानी चाहिए,जितनी आवश्यक्ता हो उतनी ही रासायनिक खादो का प्रयोग करना चाहिए, ज्यादा से ज्यादा जैविक खादों का प्रयोग करना चाहिए, जिससे मिट्टी और इंसान दोनों की सेहत सुधरेगी
वहीं प्रयोग शाला में मिट्टी की जांच करने वाले टेक्नीशियन का कहना है की किसानों के खेत से मिट्टी लेकर जांच की जाती है, बहोत से किसान खुद अपनी मिट्टी जांच कराने के लिए आते हैं,विभाग द्वारा भी किसानों के खेत की मिट्टी लाकर जांच की जाती है,मिट्टी की जांच में आर्गेनिक कार्बन, सल्फर और जिंक की बेहद कमी पाई गई है,किसानों को इस बारे में जानकारी दी जाती है की खेत में कितनी और कौन सी खाद डाली जाए,किसान आज बड़ी मात्रा में रासायनिक खाद का प्रयोग कर रहा है,जिसकी वजह से मिट्टी की सेहत बिगड़ती जा रही है, जैविक खादो के प्रयोग के लिए किसानों को प्रेरित किया जा रहा है, जैविक खाद खेत में डालने से मिट्टी की रासायनिकस,भौतिक और जैविक स्थिति सुधरेगी,जिससे किसानों की पैदावार बढ़ेगी,रासायनिक खादों को डालने से भूमि के माइक्रो आर्गनिज्म नस्ट होते जा रहे हैं, जैविक खादों से उन की संख्या बढेगी,इस तरह से किसान 15 से 20 प्रतिशत उतपादन बढ़ा सकते हैं,जिससे उत्पादन लागत भी घटेगी।

बस्ती मण्डल के तीनों जिलों में जमीन की सेहत लगातार खराब होती जा रही है, जिसके लिए सरकार किसानों को जागरूक करने के लिए करोड़ो रूपए खर्च कर रही है, लेकिन विभागीय लापरवाही से धरातल पर जागरूकता अभियान का कोई असर देखने को नहीं मिल रहा है,बिना गांव में गए किसानों के खेत की मिट्टी की जांच कागजों में हो रही है, और उस की रिपोर्ट किसानों को भेज दी जाती है, जिन किसानों को विभाग द्वारा सर्टिफिकेट दी गई है उन को मिट्टी जांच के बारे में पता ही नहीं है, कब उन के खेत से मिट्टी निकाली गई और कब जांच होकर रिपोर्ट आ गई,जब किसानों को मिट्टी के बारे में जानकारी ही नहीं दी जाएगी तो किसान कैसे जागरूक होगा और मिट्टी की बिगड़ती सेहत से कैसे सुधारेगा,
अगर खेती में अंधाधुन रसायनों का प्रयोग कम नहीं किया गया तो आने वाल समय में मिट्टी की सेहत खराब होगी और उस की चपेट में इंसान भी आएंगे, मिट्टी बंजर होगी और इंसान भी गंभीर बीमारियों से ग्रसित होगा

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