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मनुष्य को निर्भय बनाती है भागवत कथा:अलोकानंद जी महाराज


अलीम खान 

अमेठी :मुसाफिरखाना।,भागवत कथा मनुष्य को निर्भय बनाती है पाप करते समय मनुष्य नही डरता उसे भय तब लगता है जब पापो की सजा भुगतने का समय आता है यह बातें बृंदाबन से पधारे अन्तर्राष्ट्रीय कथाब्यास अलोकानंद जी महाराज ने कही।वे माता हिंगलाज धाम में चल रहे श्री मदभागवत कथा ज्ञान महोत्सव के छठे दिवस दिन शुक्रवार को उमड़े भक्तो को कथा सुना रहे थे ।कथा ब्यास ने सुदामा चरित्र का मार्मिक वर्णन करते हुये श्री मदभागवत के बिबिध प्रसंगों की चर्चा की।संगीतमयी कथा में अलोकानंद ने कहा की धुरुव जी मृत्यु के सिर पर पाव रखकर गए।परिक्षित ने स्वयं कहा मुझे अब काल का भय अब नही आ रहा है श्री मदभागवत धर्म के साधारणी करण और जीवन के साथ ही मृत्यु सुधारने की कथा है।कहा गया है कि बिना ईस्वर के संसार अपूर्ण है भागवत सास्त्र का आदर्श दिब्य है।भक्ति केवल मंदिरो में नही जहाँ बैठ जाओ वही है दुःख मन का धर्म है आत्मा का ज्ञान नही।उन्होने कहा की सात दिनों में राजा परिक्षित ने सद्ति प्राप्ति किया।फिर हम सबका उद्धार क्यों नही होता ।हमे परिक्षित जैसा श्रोता होना चाहिये और शुकदेव जैसा हो तो उद्धार हो जाये।

अलोकानंद जी महाराज ने कहा कि पति यदि धन,सम्पति,सुख सुबिधा दे और पत्नी ऐसे पति की सेवा करे तो इसके आश्चर्य क्या है ।धन्य है सुदामा की पत्नी सुशीला जिन्होने ने भूखे रहकर भी दरिद्र पति को भी परमेश्वर मानकर सेवा करती रही।भगवान श्रीकृष्ण ने जो सम्पति कुबेर के पास भी नही है उसे सुदामा को दे दिया।सारा बिश्व श्रीकृष्ण का बंदन करता है।और वे एक दरिद्र ब्राह्मण और उनकी पत्नी सुदामा का वंदन करते है।सुदामा ने ईस्वर से निरपेक्ष प्रेम किया तो उन्होने सुदामा को अपना लिया और अपने जैसा बैभवशाली भी बना दिया।मनुष्य जब ईस्वर से प्रेम करता है तो ईस्वर मनुष्य को भी ईस्वर बना देते है।सुख दुःख तो मन की कल्पना है।जो सदगुणों से संपन्न है वह ईस्वर है और असंतुष्टि ब्यक्ति दरिद्र।कथा में कृपाशंकर सिंह मोहित गुप्ता अंजनी कुमार सर्वेशसिंह प्रशांत श्रीवास्तव पं शेषराम मिश्र  राहुल रवि अनुराग  रमाकान्त तिवारी विपुल शरद संतराम जनार्दन आदि रहे।

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