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गोंडा :शिविरार्थियों ने सीखे प्राथमिक चिकित्सा के गुण


मिथिलेश शुक्ला (नीतू पंडित)

गोंडा / बभनान :प्राथमिक उपचार आकस्मिक दुर्घटना के अवसर पर उन वस्तुओं से सहायता करने तक ही सीमित है जो उस समय प्राप्त हो सकें। प्राथमिक उपचार का यह ध्येय नहीं है कि प्राथमिक उपचारक चिकित्सक का स्थान ग्रहण करे। इस बात को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि चोट पर दुबारा पट्टी बाँधना तथा उसके बाद का दूसरा इलाज प्राथमिक उपचार की सीमा के बाहर है। प्राथमिक उपचार का उत्तरदायित्व किसी डाक्टर द्वारा चिकित्सा संबंधी सहायता प्राप्त होने के साथ ही समाप्त हो जाता है, परंतु उसका कुछ देर तक वहाँ रुकना आवश्यक है, क्योंकि डाक्टर को सहायक के रूप में उसकी आवश्यकता पड़ सकती है।



प्राथमिक उपचार में आवश्यक बातें
  प्राथमिक उपचारक को आवश्यकतानुसार रोगनिदान करना चाहिए, तथा घायल को कितनी, कैसी और कहाँ तक सहायता दी जाए, इसपर विचार करना चाहिए।
रोग या घाव संबंधी आवश्यक बातें  रोगी की स्थिति, इसमें रोगी की दशा और स्थिति देखनी चाहिए।

   चिन्ह, लक्षण या वृत्तांत, अर्थात् घायल के शरीरगत चिन्ह, जैसे सूजन, कुरूपता, रक्तसंचय इतयादि प्राथमिक उपचारक को अपनी ज्ञानेंद्रियों से पहचानना तथा लक्षण, जैसे पीड़ा, जड़ता, घुमरी, प्यास इत्यादि, पर ध्यान देना चाहिए। यदि घायल व्यक्ति होश में हो तो रोग का और वृत्तांत उससे, या आसपास के लोगों से, पूछना चाहिए। रोगके वृत्तांत के साथ लक्षणों पर विचार करने पर निदान में बड़ी सहायता मिलती है। उक्त बाते डॉ पंकज कुमार शुक्ल ने आचार्य नरेद्र देव किसान पी जी कालेज के चल रहे शिवर के दौरान शिविरार्थियो से कही। कार्यक्रम की शुरुआत सीमा,कविता द्वारा सरस्वती वंदना एवं सारिका द्वारा स्वागत गीत प्रस्तुत किया गया। वही क्षमा मिश्रा ने भजन की प्रस्तुति की। कार्यक्रमाधिकारी डॉ दिवाकर राम त्रिपाठी  द्वारा मुख्य अतिथि का  स्वागत  किया गया ।इस अवसर पर कार्यक्रमाधिकारी डॉ कमलेश उपाध्याय, डॉ उदल कुमार, डॉ सच्चिदानंद,डॉ पवन पांडे, हरिओम पांडे, कुलदीप, सुरेंद्र,विमल, मनीष सहित शिविरार्थी छात्र- छात्र-छात्राएं मौजूद रही।
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