इल्तिजा है मेरी तुम गुज़ारिश न कीजे
आँखों से दिल की सिफारिश न कीजे
भीगकर मै बहक जाउंगी फिर ज़मी सी
चाहतों की सनम तुम बारिश न कीजे
ले पर्दा हया का फिर लिपट जाउंगी मै
रुख़सार ओ लब की सताइश न कीजे
ये चंदा ये तारे और ये ज़मी देखती है
यूँ छत पर बुलाकर नुमाइश न कीजे
चौदहवीं के बहाने तो आ भी गयी हूँ
चांदनी को वजह-ए-नाज़िश न कीजे
हुस्न-ऐ-चाँद की तुम तारीफ करके
मुझको सताने की साज़िश न कीजे
दिल से दिल की हैं नज़दीकियाँ गहरी
मानों तो रूठकर आज़माइश न कीजे
हुस्न-ऐ-यारा हूँ महज़ शब् भर तुम्हारी
ख्वाबों को हकीकत के काविश न कीजे
मधुसुधा


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