असगर नकी
नोएडा, यूपी. यहां के पॉश कॉलोनी में रहने वाले 15 वर्ष के अरमान सिंह अहलुवालिया इस खेलने पढ़ने की उम्र में अपने आसपास के दर्जनों गरीब बच्चे जो स्कूली शिक्षा एवं मूलभूत सुविधावो से वंचित है उनकी देखभाल कर रहे हैं, विद्यादान दे रहे हैं तथा उनकी मूलभूत आवश्यकताओं को पूर्ण करने का अथक प्रयास कर समाज के सामने एक अद्भुत मिसाल कायम कर रहे हैं।
नोएडा के सेक्टर 92 में रहने वाले अरमान सिंह अहलुवालिया दिल्ली में मशहूर स्कूल डीपीएस आर के पुरम से अपनी पढाई कर रहे हैं ।
पढाई में हमेशा अव्वल आने वाले अरमान जब रोजाना स्कूल जाते तो रास्ते में रेड लाइट पर खड़े अनेको गरीब बच्चो को देख कर हमेशा उनके मन में प्रश्न आता की ये बच्चे स्कूल कब जाते होंगे और इनके कपडे, खाना कैसे होता होगा । बालमन में कई सारे सवाल गूजने लगे और अरमान ने ये सवाल अपनी माँ से किया और पुछा की मम्मी इनके लिए कोई कुछ करता क्यों नहीं ।अरमान के बार बार अनुरोध और कुछ करने के इरादे को आगे बढ़ाने में उनकी माँ हमेशा तत्पर थी और अपने पुत्र के इस उच्च विचार के लिए उन्होंने अपने सेक्टर 108 नोएडा स्थित मकान के एक हिस्से को देकर अरमान को प्रेरित किया कि वह चाहे तो यहाँ ऐसे बच्चो के लिए कुछ करे। माँ की प्रेरणा और अरमान का जूनून दोनों ने मिलकर एक ऐसी व्यवस्था का आरम्भ किया जहा अरमान अपने स्कूल एवं पढाई के बाद के बचे समय को इन गरीब बच्चो के उत्थान के लिए कार्य किया जा सके।
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| अरमान सिंह |
अरमान ने उस मकान को सजाया और निकल पड़े ऐसे बच्चो की तलाश में जो मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं और शुरुवात में लगभग 10 बच्चे इकठ्ठा कर लिए तथा उन्हें शिक्षा और सुविधाएं मुहैया करने लगे जब अरमान के माता पिता ने उनकी लगन देखी तो पहले तो उन्हें लगा कही ये बच्चा अपनी पढाई का नुकसान ना कर दे परन्तु अरमान की अपनी पढाई पर कोई असर न पड़ता देख अरमान की माँ ने पूरे मकान को स्कूल की तरह सजा कर नाम दिया " अपने" ।
आज "अपने" में समाज के वंचित तबके के दर्जनों बच्चे आते है, यहाँ उन्हें शिक्षा के साथ साथ भोजन, कपड़े, दवाइया तथा भिन्न प्रकार के खेल कूद की सुविधाएं मिलती हैं। अरमान, उनका परिवार तथा उसके मित्र अब अपना जन्मदिन भी इन्ही बच्चो के साथ मनाते हैं और कहते हैं की असली ख़ुशी समाज की सेवा में हैं ।प्रारम्भ के दिनों में जो भी अरमान के इस काम को देखते थे वे लोग हमेशा इसे नकारात्मक दृष्टि से देखते थे और ये अरमान के लिए एक चुनौती थी। लेकिन अरमान कहते है की वह एक ऐसे जूनून के साथ इस कार्य में लग चुके थे की उसे किसी बात की परवाह नहीं थी और वो तो सिर्फ एक ही उद्देश्य से आगे बढ़ते रहे की हर हाल में जो भी उसके पास समय बचेगा उसमे उन बच्चो के लिए समर्पित होकर काम करेगा।
अरमान की माँ डॉ. तरविंदर कौर अहलुवालिया जो की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत थी पर अरमान के सपने को पूरा करने के लिये उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया वो अरमान को हॉवर्ड जैसे संस्थान में पढ़ना चाहती हैं। वही अरमान का कहना है की मै हॉवर्ड जैसे संस्थानों को भारत लाना चाहता हु जिस से समाज के सभी तबको के बच्चो को उचित शिक्षा एवं बेहतर भविष्य मिल सके ।
आज अरमान का यह प्रयास दूसरो के लिए एक प्रेरणा के रूप में हैं और आज यदि अरमान जैसे और बच्चे ऐसा सोचने लगे तो समाज में ऐसा कोई बच्चा नहीं होगा जो अनपढ़ और बिना भोजन और वस्त्र का रहेगा।




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