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असनहरा घाट पर पुल की दरकार अभी तक अधूरी, नेता करते रहे वादाखिलाफी






अनेको बार जलसत्याग्रह, आंदोलन भी बेअसर रहा नेताओ पर

 सांसद ने शून्यकाल में इस मुद्दे को उठाया लेकिन नतीजा सिफर 
आलोक बर्नवाल
संतकबीरनगर। जनपद के सीमावर्ती क्षेत्र में स्थित असनहरा घाट के कठिनइया नदी पर स्थित पक्के पुल की आस इस बार भी लोकसभा चुनाव के समय मे अभी तक अधूरी है। आसपास के ग्रामीण आबादी बाँस बल्ली के सहारे ही बने पुल पर जान जोखिम में डालकर पार करते है। सबसे बड़ी दिक्कत स्कूली बच्चों को होता है। जिससे इन नौनिहालों पर अपनी जान का खतरा बना रहता है। इस बार के चुनाव में यह भी संतकबीरनगर में प्रमुख मुद्दे के रूप में छाया हुआ है।


 कितने जनप्रतिनिधियों के आश्वासन के बाद भी अभी तक यह मुद्दा खत्म नही हो पाया है। जिसबाबत यहाँ के आसपास दर्जनों ग्रामपंचायत में इसे न बनाएं जाने से रोष में है। पूर्व में जनप्रतिनिधियों के वादों से जनता भी अब परेशान हो चुकी है। संतकबीरनगर और बस्ती के सीमा से लगायत यह पुल अपने निर्माण की राह को देख रहा है। विधायक से सांसद तक भी इस पुल को निर्माण नही करवा पाए। जिससे जनमानस में जनप्रतिनिधियों के उपेक्षा पूर्ण रवैए को लेकर काफी रोष है। जो अनेको बार जलसत्याग्रह के रूप में उभरा है।


 2014 के लोकसभा चुनाव के पूर्व भी इस बाबत अखिल भारतीय जल सत्याग्रह के बैनर तले जलसत्याग्रह 2013 में तीन दिन तक लगातार चला था। जिसपर शासन के अधिकारी अधिशासी अभियंता संतकबीरनगर के आश्वासन पर समाप्त करवाया गया था। इसके बाद लोकसभा चुनाव का आगमन हो गया जनता मोदी लहर में बहकर सांसद शरद त्रिपाठी को चुन लिया। जिसके बाद बदली सरकार में पुल निर्माण न होने से ग्रामीण आबादी में सरकार पर एकबार और गुस्सा हो गया। 


जिसके बाद पुनः अखिल भारतीय जल सत्याग्रह के बैनर तले 2015 में नौ दिन तक यह जलसत्याग्रह व जलसमाधि आंदोलन चला तब के खलीलाबाद विधायक डॉ मो0अयूब द्वारा आंदोलन स्थल पर पहुंचकर असनहरा घाट पुल के मुद्दे को विधानसभा में उठाने का आश्वासन दिया। लेकिन इनके प्रयास का भी नतीजा सिफर ही रहा। एक बार फिर यह मामला ठंडे में चलता रहा कि बीच में 2017 का विधानसभा चुनाव आ गया। जिसके बाद भाजपा की लहर में सवार होकर दिग्विजय नारायण उर्फ जय चौबे के विधायक रहते यह जलसत्याग्रह आन्दोलन फिर प्रारंभ हुआ था।


जिसमे इनके द्वारा असनहरा घाट पर पहुँचकर साथ मे तत्कालीन खनिज, कोयला मंत्रालय को देख रहे पीयूष गोयल के पत्र को दिखाया गया। जिसमें पुल के निर्माण को अतिशीघ्र होने को दिखाया गया। जिसकी प्रति मीडिया को दिखाया भी गया। इसके साथ ही बस्ती के सांसद द्वारा भी लोकसभा में इस मामले को शून्यकाल में मुद्दे को उठाया गया। आंदोलन स्थल पर खलीलाबाद उपजिलाधिकारी रामकेर यादव द्वारा प्रतिदिन असनहरा घाट पर जाकर आंदोलनकारियों का स्वास्थ्य परीक्षण करवाया जाता रहा। इसके साथ ही इनके समस्याओं के के निस्तारण में तत्पर रहे। 


इसके साथ ही डीएम ए के सैनी द्वारा भी इस आंदोलन को लेकर संवेदनशील रहे। लोकनिर्माण विभाग बस्ती और संतकबीरनगर की टीम द्वारा सर्वे आंकलन कर इस्टीमेट चार करोड़ अट्ठासी लाख रुपए का बनवाकर त्वरित विकास योजना के तहत डीएम के मार्फत भेजवाया गया। इस स्वीकृति पत्र की छायाप्रति आंदोलन करने वालो को दिखाया गया। जिसके बाद आंदोलन को स्थगित करवा दिया गया। पुनः यह जलसत्याग्रह आंदोलन 2018 में 1अगस्त से 24 सितंबर तक चला। सबसे लंबे पचपन दिन चले इस आंदोलन में इसबार एक सत्याग्रही देवीशरण गौड़ शहीद हो गए। जिसके बाद इस बार यू पी के कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर द्वारा असनहरा घाट पर पहुंचे साथ मे सांसद शरद त्रिपाठी व यूपी के राज्यमंत्री सकलदीप राजभर भी पंहुचे।



जिसके बाद इन लोगों के द्वारा बताया गया कि पक्के पुल के निर्माण जल्द ही नदी में पानी सूखने के बाद करवाया जाएगा। इस वादे पर आंदोलन को स्थगित करवा दिया गया। लेकिन आज छह माह बीतने के बाद भी इस पर कोई भी कार्यवाही निर्माण के बाबत नही किया गया है। इस आंदोलन में भागीदार कलावती देवी निवासी असनहरा ने बताया कि हर बार नेता ऐसे ही वादा करते है लेकिन पूरा नही करते है। जिससे इनकी बातो का कोई भरोसा नही रह गया है। आंदोलन में कर्मावती देवी ने बताया कि अब तो क्षेत्र की जनता भी नेताओ के वादों से तंग आ गई है। इसीकड़ी में आंदोलन में सहयोगी अनारा देवी ने कहा कि आज सभी जनप्रतिनिधियों ने असनहरा के जनता को ठगा है। 



हर बार कोरा आश्वासन ही इनके द्वारा दिया गया। इसतरह से पुरुषों में पुल के प्रति संघर्षरत सुखराम ने बताया कि अब सरकार लोगो के दुखदर्द से मतलब नही रह गया है। केवल अपने हित देखती है। इसीतरह से आंदोलन के सहयोगी संतराम निवासी ग्राम असनहरा ने बताया कि जब से यह जनहित का आंदोलन पुल के निर्माण हेतू चल रहा है तबसे किसी भी जनप्रतिनिधि ने संजीदगी दिखाई होती तो पुल बन गया होता और लोगों को अपनी जान जोखिम में डालकर बांस बल्ली के पुल से छुटकारा मिल गया होता। इसीतरह से यशवंत उर्फ सिंटू चौधरी निवासी ग्राम चंगेरा मंगेरा ने भी नेताओ और अधिकारियों पर पुल बनवाने के बाबत धोखा दिया गया। आजभी बड़े बूढ़े के साथ ही बच्चे भी इसी पुल से स्कूल जाते है जो बेहद ही जोखिम का कार्य है।



 इसके साथ ही इसबार जलसत्याग्रह आंदोलन में अपने पति को खोने वाली फुलवाशी देवी पत्नी देवीशरण गौड़ ने बताया कि आंदोलन के कारण ही मेरे पति के मरने के बाद भी शासन प्रशासन नहीं जागा है। जिसके कारण बेहद ही तकलीफ है और पुल के बाबत धोखा ही मिला है। इसके साथ ही अखिल भारतीय जल सत्याग्रह आंदोलन की राष्ट्रीय प्रवक्ता सरोजा राजभर ने बताया कि अब तक छह महीने हो गए लेकिन किसी भी जनप्रतिनिधि ने इस बाबत कोई भी कार्यवाही नही किया गया।


 जिससे इस बार भी जनता अपने को ठगा महसूस कर रही है। पुनः लोकसभा के बाद इस पुल के निर्माण के बाबत जल सत्याग्रह व जलसमाधि का आंदोलन होगा जो निर्माण कार्य के प्रारंभ होने पर ही खत्म होगा। इस तरह की अनेको बातो को बताया गया। अब देखते है इस बार यह लोकसभा चुनाव में इस मामले का पटाक्षेप होता है या नही।

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