ए. आर. उस्मानी
गोण्डा। समाज के दबे, कुचले एवं कमजोर वर्ग के लोगों से अच्छा सलूक करने के लिए शासन स्तर से चाहे जितने आदेश-निर्देश जारी किए जाएं, किंंतु धरातल पर पहुंचते-पहुंचते वे दम तोड़ देते हैं। आजादी के 73 वर्षों बाद भी आम लोगों की थाना परिसर में अकेले घुसने की हिम्मत नहीं होती है।
सात दशक में वैसेे तो बहुत कुछ बदला, लेकिन आम जनमानस में पुलिस की छवि में कोई बदलाव नहीं हुआ है। अंग्रेजों के समय में पुलिस की दबंग और उत्पीड़क की छवि कमोबेश आज भी वैसे ही है। हालांकि कई संवेदनशील पुलिस अधिकारियों के एसपी की कुर्सी संभालने के बाद थाने में आने वाले आगन्तुकों को सम्मान के साथ बैठने की व्यवस्था करना, पेयजल का इंतजाम करना तथा बिना रौब के मित्रवत व्यवहार अपनाते हुए उनकी समस्या सुनने की व्यवस्था की जाती है, किन्तु गरीब आदमी आज भी थाने के अन्दर पुलिस अधिकारियों को किसी ईश्वर से कम नहीं समझता है।
यही कारण है कि जब वह फरियाद लेकर अधिकारी के पास जाता है, तो हाथ जोड़कर विनती के भाव में खड़ा हो जाता है। कई बार तो फरियादी अधिकारियों के चरणों में लेट भी जाते हैं। व्यवस्था यथावत है। सवाल यह उठता है कि आखिर गरीब, निरीह, लाचार और बेेबस व्यक्ति कब तक न्याय के लिए हाकिमों के आगे हाथों को जोड़कर गिड़गिड़ाता रहेगा?
17 अगस्त को जिले के इटियाथोक थाने में आयोजित सम्पूर्ण समाधान दिवस की हकीकत परखने जब तेज तर्रार जिलाधिकारी डॉक्टर नितिन बंसल एसपी आरके नैय्यर के साथ पहुंचे तो वहां महिला और पुरूष फरियादी उनसे हाथ जोड़कर न्याय की भीख मांगते नजर आए। बताते हैं कि डीएम और एसपी के थाने में प्रवेश करते ही अपनी समस्या लेकर एक फरियादी आया और अधिकारियों के आगे हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। उसके साथ आई महिला भी याचक की भांति हाथ जोड़कर अपनी पीड़ा बताते हुए गिड़गिड़ाती रही। हालांकि, उसकी समस्या सुनकर डीएम ने मदद करने का भरोसा तो दिया,
लेकिन यह स्थिति किन परिस्थितियों में आला अधिकारियों के सामने आ रही है? इस बारे में किसी ने भी सोचने या सवाल करने की जरूरत नहीं समझी। दरअसल, थाने के लुंज पुंज सिस्टम से मायूस होने के बाद ही फरियादी बड़े अधिकारियों की चौखट पर दस्तक देते हैं। इसके पीछे उनकी बड़े हाकिमों से न्याय मिलने की उम्मीद होती है। लेकिन जिले में तो लुंज पुंज सिस्टम ने न्याय की डगर को ही जटिल बना दिया है! थाने से लेकर सीओ तक, एडिशनल एसपी से लेकर जिले के कप्तान तक, हर जगह फरियादियों को मायूसी ही मिलती है। दबंगों के रसूख, जस्टिस सिस्टम में छेद और आला अधिकारियों की उदासीनता के कारण गोण्डा में न्याय की उम्मीद खत्म होती जा रही है?


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