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संत शिरोमणि बाबा गणिनाथ महाराज ने जाति धर्म से ऊपर उठकर मानवता का पाठ पढ़ाया – डॉ लालचंद्र


आलोक बर्नवाल
सन्तकबीरनगर। बीते दिन अखिल भारतीय मद्देशीय वैश्य समाज ने  पूरे रीति रिवाज से संत शिरोमणि गणिनाथ महाराज का जन्मोत्सव कार्यक्रम को मनाया गया। जिसमें मुख्य रूप से अखिल भारतीय मद्देशीय वैश्य सभा उत्तर प्रदेश के युवा प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ लालचंद्र मद्देशीय द्वारा बताया गया कि इतिहास किसी भी देश जाति के उत्थान की कुंजी है। जिस जाति के पास अपने पूर्वजों का इतिहास नहीं उसे प्राय: मृत समझा जाता है अर्थात जिस व्यक्ति को अपने इतिहास की जानकारी नहीं तो इतिहास का निर्माण नहीं कर सकता है। वास्तव में इतिहास विज्ञान की कुंजी होता है  इतिहास वह पवित्र धरोहर है जो जाति को अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाने की कार्य करती है। उसी इतिहास के पन्नों से जाति–कान्दू, उपजाति–मध्देशिया, गोत्र– कश्यप, कुलदेव–गणिनाथ महाराज को पूजते हैं। संत गणिनाथ महाराज गुरला मांधाता पर्वत पलवैया ( बिहार) में अवतरित हुए। इसी क्षेत्रिय धरातल पर इनके वंशजों का विस्तार हुआ अर्थात कान्दू, मध्देशिया वैश्य समाज का इतिहास के पन्नों में कान्दू मध्यदेशीय समाज का बाबा गणिनाथ महाराज को कुल देवता के रूप में पूजित होने का वर्णन पाया जाता है। मान्यताओं के अनुसार भक्तों की हर मनोकामना को पूरा करने वाले व्यक्तियों में विश्वास है कि संत गणिनाथ के शरण में हर इच्छा पूर्ण होती है। बाबा गणिनाथ तेरहवीं शताब्दी के आसपास महनार के पलवैया ग्राम में अवतरित हुए थे वे शिव के अवतार कहलाते हैं। संत गणिनाथ महाराज के पिताजी मन्साराम कान्दू समाज के 14 कुलदेव में पूजित है। वैशाली महनार बिहार की धरती मानवता के लिए अपने सर्वश्रेष्ठ योगदान के लिए जानी जाती है l लोकतंत्र के जननी होने से लेकर वर्धमान महावीर के जन्म भूमि तथा गौतम बुद्ध की कर्मभूमि होने का सौभाग्य प्राप्त है। कालांतर में उसी क्रम में संत प्रवर बाबा गणिनाथ महाराज की चरण धूल से पवित्र होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। संत गणिनाथ महाराज का अवतरण"भाद्र कृष्ण पक्ष जन्माष्टमी के बाद आने वाले शनिवार को वैशाली जिला के पलवैया महनार नामक स्थान पर हुआ था। जो आज भव्य मंदिर के रूप में स्थापित है। पलवैया धाम पर्यटक स्थल एवं आस्था का केंद्र बिंदु है। देश के कोने-कोने से  लाखों श्रद्धालु भक्त भारत समेत नेपाल से दर्शन हेतु जाते हैं l भगवान शिव के मानस पुत्र अवतारी संत गणिनाथ महराज गृहस्थ जीवन में होने के बावजूद भी उनका अवतरण लोक कल्याण तथा परम मानवीय मूल्यों की स्थापना हेतु था। उन्होंने अपने अलौकिक शक्तियों से न केवल समाज में व्याप्त बुराइयों को समाप्त करने पर जोर दिया, बल्कि साथ-साथ समाज में ब्याधि ग्रस्त तथा असाध्य रोगों से व्यथित लोगों का कायाकल्प किया। संत गणिनाथ महाराज के तमाम चमत्कारिक गुण मिलते हैं गणिनाथ महाराज ने सभी जातियों, वर्णो, धर्मों के भेदभाव को भुलाकर मानवता के आदर्श का पाठ पढ़ाया और जनकल्याण की सेवा में अपना जीवन को परित्याग किया l

संत गणिनाथ महाराज ने चार उपदेश दिए जो निम्न रूप से पहला वेदों का अध्ययन करें, दूसरा सच्चाई और धर्म का पालन करें, तीसरा काम क्रोध लोभ अभिमान आलस्य का त्याग करें एवं चौथा नारी का सम्मान और उसकी रक्षा करें।
 अखिल भारतीय मध्देशिया (कान्दू) वैश्य समाज नेपाल समेत पूरे भारत में 31 अगस्त को गणिनाथ जन्मोत्सव मनाया गया। अन्य उपजाति के लोग भी अपने - अपने तरीके से संत गणिनाथ महाराज का जन्मोत्सव वह पूजनोत्सव श्रद्धापूर्वक मनाते हैं। जिससे समाज सहयोग और सहृदयता बना रहे।

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