पूर्वी सहोदरपुर में चल रही है संगीतमई कथा
शिवेश शुक्ला
प्रतापगढ । भगवान की लीला जीवनोपयोगी है, इसे आत्मसात कर हम अपना यही लोक और परलोक दोनों सुधार सकते हैं। उक्त बाते पूर्वी सहोदरपुर में शारदा प्रसाद पाण्डेय व श्रीमती रामसंवारी पाण्डेय के आयोजन में चल रही संगीतमयी श्रीमदभागवत कथा के पाचवे दिन कथा वाचक आचार्य पंडित रमेश चन्द्र पाण्डेय ने श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं पर चर्चा करते हुए कही । उन्होने भगवान कृष्ण की लीला के प्रसंग को सुनाते हुए बताया कि भगवान को जो भाव से थोड़ा देता है उसे भगवान संपूर्ण सुख प्रदान कर देते हैं।कथा व्यास ने गिरिराज पूजनोत्सव के सरस वर्णन से कथा का विस्तार किया। सरस प्रसंगो, आख्यानों, एवं संगीतमय भजनों पर श्रोता जमकर झूमे एवं भावविभार होकर जय ध्वनि एवं करतल ध्वनि करते रहे। मोहक झाॅकियों के माध्यम से प्रभु की सरस ललित ब्रज लीलाओं का प्रस्तुतीकरण किया गया। जिसे देखककर श्रोता मंत्रमुग्ध हो गये।इस बीच कथावाचक ने भगवान की माखन चोरी लीला और पूतना वध जसे रोचक प्रसंग पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि गोवर्धनका अर्थ है गौ संवर्धन। भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत मात्र इसीलिए उठाया था कि पृथ्वी पर फैली बुराइयों का अंत केवल प्रकृति एवं गौ संवर्धन से ही हो सकता है। उन्होंने कहा कि अगर हम बिना कर्म करे फल की प्राप्ति चाहेंगे तो वह कभी नहीं मिलेगा, कर्म तो हमें करना ही होगा। "घमंड तोड़ इंद्र का, प्रकृति का महत्व समझाया, ऊँगली पर उठाकर पहाड़, वो ही रक्षक कहलाया ।।कथावाचक ने गोवर्धन पर्वत की कथा सुनाते हुए कहा कि इंद्र के कुपित होने पर श्रीकृष्ण ने गोवर्धन उठा लिया था। इसमें ब्रजवासियों ने भी अपना-अपना सहयोग दिया। श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों की रक्षा के लिए राक्षसों का अंत किया तथा ब्रजवासियों को पुरानी चली रही सामाजिक कुरीतियों को मिटाने एवं निष्काम कर्म के जरिए अपना जीवन सफल बनाने का उपदेश दिया। इसके जरिये जलवायु एवम प्राकृतिक संसाधन का धन्यवाद दिया जाता हैं | इस पूजा के कारण मानवजाति में इन प्राकृतिक साधनों के प्रति भावना का विकास होता हैं |यह पूजन यह सन्देश देता हैं कि हमारा जीवन प्रकृति की हर एक चीज़ पर निर्भर करता हैं जैसे पेड़-पौधों, पशु-पक्षी, नदी और पर्वत आदि इसलिए हमें उन सभी का धन्यवाद देना चाहिये | भारत देश में जलवायु संतुलन का विशेष कारण पर्वत मालायें एवम नदियाँ हैं | इस प्रकार यह पूजन इन सभी प्राकृतिक धन सम्पति के प्रति हमारी भावना को व्यक्त करता हैं । कथा के दौरान प्रमुख रूप श्याम सुन्दर पाण्डेय, अरविन्द शुक्ला, शिवशंकर शुक्ल, मलय शुक्ल, रंजना, मंजू, पायल, बंदना समेत सैकडो श्र्दालुगण मौजूद रहे ।


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