महिलाओं के खिलाफ अपराध रोके विना समाज का विकास
सम्भव नहीं:नसीम अंसारी
70 प्रतिशत महिलाएं किसी न
किसी हिसा की शिकार
प्रतापगढ़: महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा रोके विना समाज का विकास
सम्भव नहीं। इसके लिए महिलाओं को निर्णय में शामिल करने व अपनी पसन्द व्यक्त करने
का अवसर देना होगा। उक्त विचार 16 दिवसीय महिला हिंसा विरोधी पखवारा के दौरान ’’बनो नई सोच’’ व एक साथ अभियान के अन्तर्गत 03 दिसम्बर को चेतना सभागार
में आयोजित पत्रकार वार्ता में तरुण चेतना के निदेशक मु0 नसीम अंसारी ने व्यक्त किया
।
श्री अंसारी ने बताया कि महिलाओं के
खिलाफ होने वाली हिंसा में लगातार वृद्धि हो रही है। आज हमारे देश में एक घंटे में
26 यानी हर दो मिनट पर महिलाओं के ऊपर होने वाली एक हिंसा का मामला दर्ज होता है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं और ज्यादा है। श्री अंसारी के अनुसार देश में
आईपीसी0 की धारा 498-ए के तहत पति और रिश्तेदारों द्वारा किसी भी महिला को
शारीरिक या मानसिक रुप से चोट पहुंचाना देश में सबसे अधिक होने वाला अपराध है। इसी
तरह धारा 354 के तहत किसी भी महिला की लज्जा भंग करने के आशय से उस पर
हमला या आपराधिक बल प्रयोग करना जैसी वारदातें देश में होने वाला दूसरा सबसे अधिक
अपराध है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, कुछ राष्ट्रीय हिंसा पर की
गई अध्ययन कहती है कि करीब 70 फीसदी महिलाओं ने अपने अंतरंग साथी से उनके जीवन
में शारीरिक या यौन हिंसा का अनुभव किया है।
इस अवसर पर फसल परियोजना समन्वयक
समीम अंसारी में कहा कि आज महिलाएं अपने घर की बंदिशों को तोड़ने का प्रयास कर रही
हैं मगर हमें उन्हें अवसर देना होगा। जमीन का हक व महिला हिंसा पर चर्चा करते हुए
मो0 समीम ने कहा कि जिन महिलाओं कांे जमीन का हक मिला है उनमें घरेलू ंिहंसा का
सिर्फ 7 प्रतिशत रहा जबकि अन्य में यह 59 प्रतिशत रहा। श्री समीम के
अनुसार उ0 प्र0 में सिर्फ साढ़े 6 प्रतिशत जमीन महिलाओं के पास है जबकि दूसरी तरफ 88 प्रतिशत जमीन पर पुरुषों का कब्जा है। हालांकि रेवन्यू कोड ऐक्ट व हिन्दू
उत्तराधिकार अधिनियम में संशोधन करके पत्नी व बेटी को भी कागज में उत्तराधिकारी
बनाया गया है मगर इसे अभी जमीन पर उतारना बाकी हैं, जिसके लिए पुरुषों को अपनी
नजरिए में बदलाव लाना होगा।
इस अवसर पर मैसवा मैन हकीम अंसारी
ने कहा कि समाज के निर्माण में महिलाओं की अहम भूमिका है मगर सरकार द्वारा दिया
गया 33 प्रतिशत का आरक्षण नाकाफी है। उन्होंने कहा कि महिलाओं के उत्थान किये बगैर
समृद्धिशाली राष्ट्र की कल्पना करना बेमानी होगा, इसके लिए हमें उनकों अवसर व
सहयोग देने की जरूरत है। कार्यक्रम में अच्छेलाल विन्द ने कहा कि विडंबना है कि
संपूर्ण साक्षरता के लिए जाना जाने वाला राज्य केरल में भी महिलाएं सुरक्षित नहीं.
यहां पिछले वर्ष 1347 महिलाओं के साथ बलात्कार का मामला दर्ज किया गया.
महिलाओं के सशक्तीकरण व अधिकार पाने में उनके समक्ष लिंग भेद व महिला हिंसा
जैसी अनेक चुनौतियाॅ है, जिसका वे संगठन के बल पर ही मुकाबला कर सकती हैं।
उन्होंने बताया कि महिलाओं को कानूनी रूप से बहुत सारे अधिकार पहले से ही है और कई
अधिकार दिल्ली के दामिनी काण्ड के बाद मिले है। अब उसे खुद में उतारने व उसके
प्रति जागरूक होने की बारी है। श्री वर्मा ने जोर देकर कहा कि महिलाएं अपने हक की
लड़ाई अबला नहीं सबला बन कर खुद लड़े, जीत उनके हाँथों में होगी।
कार्यक्रम में रीना देवी, आरती देवी, शकुन्तला, विन्दू देवी, राकेश गिरि व श्यामशकर शुक्ल सहित तमाम लोग मौजूद रहे।
क्या है विभिन्न संस्थाओ का सर्वे रिपोर्ट
यूनिसेफ की हालिया रिपोर्ट ‘हिडेन
इन प्लेन साइट’
से उजागर हुआ है कि भारत में 15 साल
से 19 साल
की उम्र वाली 34 फीसद
विवाहित महिलाएं ऐसी हैं, जिन्होंने अपने पति या साथी के हाथों
शारीरिक या यौन हिंसा झेली हैं. इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 15 साल
से 19 साल
तक की उम्र वाली 77 फीसद महिलाएं कम से कम एक बार अपने
पति या साथी के द्वारा यौन संबंध बनाने या अन्य किसी यौन क्रिया में जबरदस्ती का
शिकार हुई हैं. इसी तरह 15 साल से 19 साल
की उम्र वाली लगभग 21 फीसद महिलाएं 15 साल
की उम्र से ही हिंसा झेली हैं. 15 साल से 19 साल
के उम्र समूह की 41 फीसद लड़कियों ने 15 साल
की उम्र से अपनी मां या सौतेली मां के हाथों शारीरिक हिंसा झेली हैं जबकि 18 फीसद
ने अपने पिता या सौतेले पिता के हाथों शारीरिक हिंसा झेली है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जिन लड़कियों की शादी नहीं
हुई, उनके
साथ शारीरिक हिंसा करने वालों में पारिवारिक सदस्य, मित्र, जान-पहचान
के व्यक्ति और शिक्षक थे. संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष तथा वाशिंगटन स्थित संस्था
‘इंटरनेशनल
सेंटर पर रिसर्च ऑन वुमेन’(आईसीआरडब्ल्यु) से उद्घाटित हुआ है
कि भारत में 10 में
से 6
पुरुषों ने कभी न कभी अपनी पत्नी अथवा प्रेमिका के साथ हिंसक व्यवहार किया है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि यह प्रवृत्ति उनलोगों में ज्यादा है जो आर्थिक तंगी का
सामना कर रहे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक 52 फीसद
महिलाओं ने स्वीकारा है कि उन्हें किसी न किसी तरह हिंसा का सामना करना पड़ा है.
इसी तरह 38 फीसद
महिलाओं ने घसीटे जाने, पिटाई, थप्पड़
मारे जाने तथा जलाने जैसे शारीरिक उत्पीड़नों का सामना करने की बात स्वीकारी है.
एनसीआरबी की
रिपोर्ट के अनुसार, 2015 में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र
और पश्चिम बंगाल में महिलाओं के खिलाफ हुए अत्याचार के सबसे ज्यादा मामले दर्ज
हुए. उत्तर प्रदेश में जहां 35 हजार 527 मामले
सामने आए,
वहीं महाराष्ट्र में 31 हजार 126 और
पश्चिम बंगाल में 33 हजार 218.



एक टिप्पणी भेजें
0 टिप्पणियाँ