सुनील कुमार पाण्डेय
गोरखपुर। गोरखपुर के तरकुलहा में देवी मां दुर्गा का एक ऐसा मंदिर है, जिसकी निर्माण में भव्यता नहीं है, लेकिन देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति दिलाने के इतिहास में वह अपना नाम बड़ी ही मजबूती से दर्ज करा चुका है। तरकुलहा देवी मंदिर में आज भी मां के भक्तों की अपार भीड़ श्रृद्धा के साथ जुटती है।
तरकुलहा देवी मंदिर।
दरअसल, गोरखपुर से करीब बीस किलोमीटर पूरब और दक्षिण की दिशा में गोर्रा नदी के तट पर तरकुलहा देवी का मंदिर है। मंदिर का इतिहास देश की आजादी और क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ा हुआ है। आज जहां पर यह मंदिर स्थित है, वहां सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय विशाल जंगल हुआ करता था। यहीं पास के डुमरी रियासत के बाबू बंधू सिंह रहते थे ।जो एक तरकुल के पेड़ के नीचे पिंडी रूप में मां भगवती की स्थापना कर उनकी पूजा करते थे।
उस जगह पर आज मां भगवती का एक छोटा मंदिर बना है। हर दिन सुबह पांच बजे मां की आरती होती है, जिस दौरान सिर्फ कपूर का ही प्रकाश होता। लोग बड़ी श्रृद्धा के साथ मां के दर्शन कर अपनी मुरादें पूरी होने की कामना करते हैं। मंदिर की कहानी यहीं नहीं रूकती है। देश जब गुलामी के दौर में था तो उन दिनों अंग्रेजों की बर्बरता देश में चरम पर थी, जिसे सुनकर सबका खून खौल जाता था। कुछ ऐसा ही देश भक्ति का भाव युवा बंधू सिंह में भी जागा।
स्थानीय लोगों का कहना है कि बंधू सिंह गुरिल्ला लड़ाई में माहिर थे। जब भी कोई अंग्रेज जंगल की तरफ से गुजरता था तो, वह उसका सर काटकर देवी मां के चरणों में समर्पित कर देते थे। पहले तो अंग्रेज यही समझते थे की उनके सिपाही जंगल में जाकर कहीं गायब हो जा रहे हैं, लेकिन धीरे–धीरे उन्हें पता हो गया की अंग्रेज सिपाही बंधू सिंह के शिकार हो रहे हैं। अंग्रेजों को एक देशद्रोही स्थानीय व्यापारी से बंधू सिंह के बारे में जानकारी मिली। अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
अदालत ने बंधू सिंह को फांसी की सजा सुना दी। अंग्रेंजों ने उन्हें अलीनगर चौराहे पर सार्वजनिक रूप से एक बरगद के पेड़ पर फांसी पर लटका दिया, लेकिन उनका प्रयास छह बार विफल हो गया। बंधू सिंह का फांसी का फंदा बार-बार टूट जा रहा था। अंग्रेज भी हैरान हो गए थे कि आखिर फांसी का फंदा बार-बार क्यों टूट जा रहा है। अंग्रेजों के हौसले पस्त होते देख वीर बंधू सिंह ने अपनी आराध्य मां तरकुलहा देवी से देशहित में बलिदान हो जाने की विनती की, जिसे मां तरकुलहा देवी ने स्वीकार कर लिया। अंग्रेज उन्हें सातवीं बार फांसी देने में सफल हो पाए।
इस घटना के तत्काल बाद जिस तरकुल के पेड़ के नीचे बंधू सिंह मां की आराधना करते थे वह गर्दन से टूटकर गिर गया और उसमें से रक्त बहने लगा, जिसके बाद यह स्थान तरकुलहा देवी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गया। तरकुलहा देवी मंदिर में भी हर मंदिर की तरह नारियल और अन्य प्रसाद चढ़ता है, लेकिन लोगों ने यहां के प्रसाद को मीट–बाटी नाम दिया है। मंदिर परिसर में लोग खुलकर मीट-बाटी बनाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि शहीद बंधू सिंह ने देवी मां को अंग्रेजों की बलि देने की जो परंपरा शुरू की थी, उसे बकरे की बलि देकर जीवंत रखने की कोशिश की जाती है। यही वजह है की इस परंपरा को यहां बंद करने के लिए कोर्ट में केस भी चल रहा है। मंदिर में सालभर में एक बार बड़ा मेला लगता है, जिसकी शुरुआत चैत्र रामनवमी से होती है। यह मेला एक माह तक चलता है। यहां मन्नत के तौर पर लोग घंटियां बांधते हैं। मंदिर में सोमवार और शुक्रवार का दिन दर्शन–पूजन के लिए बड़ा शुभ माना जाता है।


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