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नेताओं को चरित्र की चिंता क्यों नहीं?



राघवेंद्र प्रसाद मिश्र
बदलते समाजिक परिवेश ने नेताओं के हाव-भाव व व्यवहार को बदल दिया है। एक समय था जब क्षेत्र, समाज व देश का प्रतिनिधित्व करने वाले लोग प्रेरणास्रोत हुआ करते थे। लेकिन वक्त व हालात ने आज ऐसा परिवेश सृजित कर दिया है कि कोई भी नेता अब देश के लिए आदर्श बनने को तैयार ही नहीं है। बीते कुछ वर्षों में सडक़ से लेकर संसद तक नेताओं का जो रूप उभकर आया है वह बेहद शर्मनाक है। नेताओं की जनसभाओं में  पार्टी कार्यकर्ता व समर्थक इसलिए जाते थे ताकि वहां वह अपने प्रिय नेता से मिल सकें और उनसे कुछ सीख सकें। नेता भी अपनी जनसभाओं में भाषा की मर्यादा व जन सरोकारों का खासा ख्याल रखते थे। लेकिन जनसभाओं में भीड़ इक्कट्ठा करने की होड़ ने पूरा आज पूरा वातावरण ही बदल दिया है। पैसे से जुटाई गई भीड़ को अब न तो नेता से मतलब है और न ही नेताओं को ऐसी भीड़ से कोई सरोकार रह गया है। शायद यही वजह है कि अब नेता मंच से कार्यकताओं को संबोधित करने की जगह विपक्षी दलों पर इतना हमलावर हो जाते हैं कि उसे अपनी भाषा की मर्यादा का भी ख्याल नहीं रह जाता। वह यह भूल जाता है कि उसका यही व्यवहार समाज में उसका आदर्श स्थापित करेगा।
डॉ. राममनोहर लोहिया, पं. दीन दयाल उपाध्याय, जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव व श्यामा प्रसाद मुखर्जी सरीखे नेताओं वाले देश में जनप्रतिनिधियों का आचरण इतने निम्न स्तर का हो गया है कि वे ईश्वर व महिलाओं पर भी अमर्यादित टिप्पणी करने से बाज नहीं आते हैं। हालांकि इसके लिए सीधे तौर पर नेताओं को ही जिम्मेदार मानना उचित नहीं होगा। इसके लिए हमारा समाज भी दोषी है। आदर्श की बात करने व आदर्शवादी होने में बड़ा फर्क होता है, और इसी फर्क का फायदा आज हर कोई उठा रहा है। गुंडों-बदमाशों को नकारने वाला समाज आज इन्हें अपना चुका है। एक दौर था जब किसी से कोई अपराध हो जाता था तो उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता था। समाज के साथ रिश्तेदार व घर वाले ऐसे लोगों से रिश्ता खत्म कर लेते थे। लेकिन मौजूदा दौर ठीक इसी का उलट हो गया है। घरवालों के साथ-साथ समाज के लोग भी जघंय अपराध में शामिल अपराधियों को संरक्षण देने में अब परहेज नहीं कर रहे हैं। शायद वही वजह है कि आज अधिकतर आपराधिक प्रवृत्ति के लोग जनप्रतिनिधित्व कर रहे हैं। 
गत 11 मार्च को केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में 1765 सांसदों-विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज किये गये। ये आंकड़े केंद्र ने देशभर के हाईकोर्ट से एकत्र करके सुप्रीम कोर्ट में पेश किए गये। इन आंकड़ों में 3816 आपराधिक मामले थे, जिनमें से 771 मामले  निपट चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में नामांकन भरते समय आपराधिक मुकदमा लंबित होने की घोषणा करने वाले विधायकों-सांसदों के मुकदमों की स्थिति पूछी थी। साथ ही एक वर्ष में निपट चुके मामलों की जानकारी भी मांगी थी। कोर्ट ने यह आदेश 10 मार्च, 2014 को भाजपा नेता और वकील अश्वनी कुमार उपाध्याय की याचिका पर दिए थे, जिसमें सजायाफ्ता जनप्रतिनिधियों के चुनाव लडऩे पर आजीवन रोक लगाने की मांग की गई है। फिलहाल सजा के बाद जेल से छूटने के छह वर्ष तक चुनाव लडऩे की अयोग्यता अभी भी है। सुप्रीम कोर्ट में पेश केंद्र सरकार के इस हलफनामे में उत्तर प्रदेश पहले, तमिनाडु दूसरे, बिहार तीसरे, पश्चिमी बंगाल चौथे और आंध्र प्रदेश पांचवें नंबर पर है। राजनीति को अपराध मुक्त बनाने की कवायद वैसे काफी दिनों से चल रही है पर माननीयों के अपराधों का लेखा-जोखा इन उम्मीदों को धराशायी करता दिख रहा है।  
माननीयों ने देश में जिस तरह जातिवाद, क्षेत्रवाद, धनबल, बाहुबल की राजनीति को बढ़ावा दिया है उससे अपराध व अपराधियों का बढऩा स्वाभाविक है। देश में शिक्षा का स्तर काफी सुधरा है, लेकिन समाज में क्षेत्रवाद व जातिवाद आज भी हावी है। राजनीतिक दल इसी के आधार पर प्रत्याशियों का चयन करते हैं और जनता ऐसे ही लोगों विजयी भी बनाती है। जिस देश में लालू प्रसाद यादव, ओम प्रकाश यादव, शहाबुद्दीन, मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भइया जैसे लोग लगातार अपने क्षेत्र से जीतते रहे हो ऐसे में अपराध मुक्त राजनीति की बात करना तो बेमानी ही होगा।
कटु सत्य तो यह है कि अपराधी राजनीति के संरक्षण में फलता-फूलता है। छोटे-मोटे जुर्म में कानून से बचने के लिए ऐसे लोगों को पहले नेताओं का संरक्षण प्राप्त होता है और देखते ही देखते कब ये जनप्रतिनिधि बन जाते हैं पता ही नहीं चलता। इसी का नतीजा है कि राजनीति में कौन किस दल के साथ है पता नहीं चलता। हाल ही में सपा से भाजपा में शामिल हुए नरेश अग्रवाल इस समय राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बने हुए हैं। हिंदू विरोधी छवि के चलते अग्रवाल पार्टी नेताओं व कार्यकर्ताओं को हजम तो नहीं हो रहे हैं पर मजबूरी के चलते उनके खिलाफ मुखर होने को कोई तैयार नहीं है। कांग्रेस पार्टी से राजनीति की शुरुआत करने वाले नरेश अग्रवाल बसपा व सपा का सफर करते हुए अब भाजपा में शामिल हो चुके हैं। बात अवसरवाद की करें तो इससे विभत्स चेहरा शायद ही कोई हो। 
राष्ट्रवाद की बात करने वाली भाजपा नरेश अग्रवाल को पार्टी में शामिल करते हुए यह भूल गई कि सात जुलाई, 2017 को राज्यसभा में नरेश अग्रवाल ने हिंदू देवी-देवताओं को मदिरा से जोड़ते हुए विवादित बयान दिया था। इस पर राज्यसभा में काफी हंगामा भी हुआ था, बाद में नरेश अग्रवाल के इस बयान को सदन की कार्रवाई से हटा दिया गया था। दिसंबर, 2017 में अग्रवाल ने पाकिस्तान की जेल में बंद कुलभूषण जाधव के मामले में विवादित बयान देते हुए कहा था कि- किसी देश की क्या नीति है, वह देश जानता है। कुलभूषण को पाकिस्तान अगर आतंकी मानता है तो उस हिसाब से व्यवहार करेगा। हमारे देश में भी आतंकियों के साथ कड़ा व्यवहार किया जाना चाहिए। अग्रवाल के इस बयान के पीछे चाहे जो तर्क रहा हो पर इसमें पाकिस्तान का समर्थन साफ था। कुछ इसी तरह नरेश अग्रवाल ने 6 फरवरी, 2018 को श्रीनगर के एक अस्पताल से साथी आतंकी को छुड़ा ले जाने की घटना पर विवादित बयान देते हुए कहा था- जब हम आतंकियों से नहीं निपट पा रहे हैं तो अगर पाकिस्तानी फौज आ गई तो क्या करेंगे। अग्रवाल का यह बयान अकारण नहीं था उन्हें यह पता था कि देश का एक वर्ग ऐसा भी है जो उनके इस बयान से खुश होगा। 
बहरहाल जनता को यह सोचना होगा कि अच्छी बातें करने से कुछ बदलने वाला नहीं है। वास्तव में अगर बदलाव लाना है तो जाति, धर्म से ऊपर उठकर अच्छे लोगों का सपोर्ट करना होगा। राजनीति को अपराध मुक्त करने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट चाहे जितना प्रयास कर ले, लेकिन जनता जब तक ऐसे लोगों का चयन करना बंद नहीं करेगी स्वच्छ राजनीति की बात करना केवल कोरी कल्पना ही होगी। माननीयों को भी सोचना होगा धनबल-बाहुबल से जीत व सत्ता तो मिल सकती है पर इतिहास में पहचान पाने के लिए एक आदर्श स्थापित करना होगा। आदर्शवादी नेताओं के नाम पर राजनीति तो हो सकती है, लेकिन उनके जैसा बनने के लिए उनके आदर्शों को अपनाना होगा। जो थोड़ा मुश्किल तो है पर असंभव नहीं।

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