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दिल जिधर ले जाना चाहे, उधर जाने का हक है


सुनील उपध्याय 
बस्ती। ‘सदियों की ठंढी, बुझी राख सुगबुगा उठी, मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है, दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’’ जैसे पंक्तियों के रचनाकर महाकवि  रामधारी सिंह दिनकर को उनके 44 वीं पुण्य तिथि पर याद किया गया। मां ब्राम्ही शैक्षिक, सांस्कृतिक एवं लोक कल्याणकारी संस्था की ओर से मंगलवार को कलेक्टेªट परिसर में दिनकर जी के व्यक्तित्व पर चर्चा के साथ उनके योगदान को रेखांकित किया गया। 
पूर्व प्रधानाचार्य डॉ. कमलेश पाण्डेय ने दिनकर जी के व्यक्तित्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुये कहा कि दिनकर दिल से युद्ध के पक्ष में रहे और चिंतन के स्तर पर शांति के पक्ष में,  उनके  के साहित्यिक व्यक्तित्व का एक पहलू भावुक युवक का है, दूसरा पहलू गंभीर चिंतक का है, दिनकर का गद्य दिनकर का दिमाग है, कविता उनका दिल. ‘कुरुक्षेत्र’ में उन्होंने हृदय और मस्तिष्क को एक साथ मिलाने की कोशिश की है. ‘कुरुक्षेत्र’ में द्वंद्व का कारण यही है। 
शिक्षा विद त्रिभुवन प्रसाद मिश्र ने कहा कि जनता और साधारण लोगों की बात दिनकर की कविता में बार-बार आती है।  उनकी कविताओं में यह सवाल भी आता है कि आजादी के मायने क्या हैं? यह आजादी किसके लिए है? डा. रामकृष्ण लाल जगमग ने दिनकर जी को नमन् करते हुये कहा कि उनकी कविता ‘रोटी और  स्वाधीनता’ में तो इकबाल भी आते हैं और टैगोर भी. यहां मार्क्स भी हैं और गांधी भी हैं। 
अध्यक्षता करते हुये सत्येन्द्रनाथ मतवाला ने कहा कि  जब दिनकर ये कहते हैं कि आजादी का मतलब सोचने का हक है, बोलने का हक है, दिल जिधर ले जाना चाहे, उधर जाने का हक है, तो वे टैगोर से प्रेरणा ले रहे होते हैं और जब वे कहते हैं कि ‘रोटी उसकी जिसका अनाज, जिसकी जमीन, जिसका श्रम’ और आजादी का मतलब मेहनत का फल पाना और शोषण की धज्जियां उड़ाना है, तो वे मार्क्स के करीब पहुंच जाते हैं। 
महाकवि दिनकर पर केन्द्रित गोष्ठी को श्याम प्रकाश शर्मा, हरीश दरवेश, ओम प्रकाशनाथ मिश्र, कृष्ण चन्द्र पाण्डेय, ओम प्रकाशधर द्विवेदी आदि ने सम्बोधित करते हुये कहा कि उनका रचना संसार व्यापक है। दिनकर के रचनाओं की प्रासंगिता सदैव  बनी रहेगी। 

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