गोण्डा :- वजीरगंज क्षेत्र के रामपुर में सोमवार दोपहर में हरीश तिवारी के दरवाजे पर एक कार आ कर रुकती है व उससे एक दम्पति उतरते हैं।अंग्रेजी भाषा भाषी दम्पति व अंग्रेजी में परास्नातक हरीश तिवारी के मध्य जब बातचीत होती है तो सत्यता जानने के बाद घर वाले भी भाव विह्वल हो कर आगन्तुकों के हाथ थाम लेते हैं व उनसे गले मिलते हैं।उनकी आरती उतारी जाती है व माथे पर टीका लगाया जाता है।यह जान कर सुखद आश्चर्य होता है कि दम्पति अपने ही परिवार के वर्ष 1891ईस्वी में घर छोड़ कर गए राम चूर के वंशज हैं और अपनी माटी को देखने की लालसा इन्हें ऑस्ट्रेलिया से यहां खींच लाई है।रामपुर पूरे डाढू निवासी हरीश तिवारी के अनुसार उनके परदादा राम दास, राम स्वरूप व राम चूर तीन भाई थे।वर्ष 1891 में रामचूर घर छोड़ कर कोलकाता चले गए व उसके बाद से उनका कोई पता नहीं चला।घर पर आए हुए उनके वंशज भोज दत्त बिहारी महराज से पता चला की राम चूर कोलकाता से दक्षिण अफ्रीका चले गए थे।जहां उन्होंने अपना घर बसाया।रामचूर के पौत्र राघव दत्त वहां से पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में बस गए व एक मंदिर में पुजारी का काम करने से बिहारी महराज की पदवी मिली।उनके पुत्र भोजदत्त बिहारी महराज एकॉउंटेन्ट के पद से सेवानिवृत्त हुए जबकि उनकी पत्नी रेणुका महराज एडवोकेट हैं।भोजदत्त बिहारी महराज के अनुसार उनके पास यहां के पते के रूप में केवल ग्राम रामपुर तहसील तरबगंज ,गोण्डा ही था।उन्होंने एक एनजीओ के माध्यम से तहसील के समस्त रामपुर गावों को खंगालना शुरू किया।अंत मे उन्हें अपना गन्तव्य रामपुर मिल ही गया।वर्तमान में उनकी वंशावली के यहां अलग -अलग तीन घरों में रह रहे परिजन उन्हें अपने -अपने घरों में ले गए व उनकी आवभगत की।लगभग 4 घण्टों के अपने रामपुर प्रवास के बाद दम्पति वाट्सएप्प व फेसबुक के जरिए जुड़े रहने के आश्वासन सहित अश्रुपूरित नेत्रों के साथ विदा हुए।


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