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" धरती की वेचैनी को बस बादल समझता है"


डॉ ओपी भारती
वजीरगंज । कवि कुमार विश्वास की ये पंक्तियां कि " धरती की वेचैनी को बस बादल समझता है"  आसमान से बरसती आग  की तपन से तड़पती धरती और झुलसते जनजीवन की अंतरात्मा को बादल ने समझ लिया है। मानसून की रुक रुक कर हो रही पहली बारिश ने धरती और जन जीवन दोनो को आनंद विभोर कर दिया है। मेघदूत तो दो दिन पहले से ही बादल के प्रेयसी धरती को सूचना देने लगे थे । 1 जुलाई को उमड़ घुमड़ घन घिर आये बदरा और धरती को कही मूसलाधार तो कही धीमी फुहार से सराबोर करने लगे। अन्नदाता  का मन भी बदलो की कृपादृष्टि को देखकर इस हौसले के मन मयूर हो चला है कि शायद  पिछले सूखे में हुए फसल के नुकसान की भरपाई इस बार हो जाये। कृषि वैज्ञानिक घाघ ने भी कहा है कि -

" रोहिणी बरसे मृग तपे, अद्रा कुछ कुछ जाय ।
   कहे घाघ सुन घाघनी स्वान भात नही खाय ।।
अर्थात-रोहिणी नक्षत्र में बरसात हो, मृग नक्षत्र में खूब तपन यानी भीषण गर्मी हो, तथा आद्रा नक्षत्र में भी कुछ कुछ गर्मी हो तो  धान की पैदावार इतना ज्यादा होगी कि कुत्ता भी भात खा खा कर ऊब जाएगा। मानसून के सुरवाती लक्षण तो सही दिख रहे है, आगे कैसा होगा ये तो भविष्य के गर्त में है कि - धरती की प्यास बुझेगी की नही ??

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