बहुत ही रात गुजारे है शजर मे हमने
सहर उजाले मोहब्बत मे जलाया करिए
तलाश खुद भी तेरी किये है बस्तियो मे तेरे
मुझे कुछ एक पल को याद आया करिए
वजूद मुझको सितारो की तरह लगता है
कि गीन के नाम मेरे रात यू ना जाया करिए
अभी इल्जाम की हद तक नही पहूँचा "पंकज"
कोई नापाक सा तोहमत भी लगाया करिए
किसी दिन रूठ के रूखसत हुआ तो रो दोगे
बडे इत्मिनान से यू दूर ना जाया करिए
कसम है तुमको मेरी कही किसी खुदगर्जी का
मेै तेरे लिए ना सही खुद को समझाया करिए
पंकज कुमार मिश्रा जौनपुरी


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