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बेवजह यूँ ही



कविता 







बेवजह यूँ चले जाना तेरा बहुत खलता है
मेरा अपना वजूद ही मुझे अब छलता है







बहुत कुछ बाकी था कहना सुनना शायद
दर्द कुछ दिल मे और कुछ मन मे पलता है








सुनो बहक जाना भले किसी के ऐतबार में
पर साया तेरा अब भी संग धूप मे चलता है











रिश्तो की शाम नही होती सुना था पंकज
उम्र का क्या है ढलता है तो बस ढलता है










बेवफा तुम थे या हम थे सोचेंगे कभी तन्हा
समय है हर दिन रफ्ता रफ्ता बदलता है
पंकज कुमार मिश्रा 

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