मोजीम खान
सिंहपुर ,अमेठी- जिले के विकास खण्ड सिंहपुर क्षेत्र के भीखीपुर गांव में स्थित बाबा अब्दुल समद शाह की मजार शांति सद्भाव प्रेम व पयामे इंसानियत का संदेश देती है। बाबा की मजार पर तीन दिवसीय 96 वाँ सालाना उर्स ताजी शुरू हो गया है। जायरीनो की आमद से मजार शरीफ गुलजार है।
उक्त उर्स मुहर्रम महीने के 25, 26 27 तारीख को प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है जो कि बाबा के पीर( गुरु) बाबा ताजुद्दीन नागपुरी की यादगार में उनके कार्यकाल से ही भीखीपुर में होता चला आ रहा है। जिसकी परंपरा आज भी कायम है। इसी तारीख को महाराष्ट्र प्रांत के नागपुर में भी बाबा ताजुद्दीन औलिया की मजार पर विशाल उर्स होता है। भीखीपुर गांव में स्थित बाबा की मजार का युग युगांतर से प्रदेश ही नहीं बल्कि देश विदेश में बसे लोगों का अटूट रिश्ता रहा है।
बाबा की मजार पर जो भी अपनी मुराद लेकर आता है वह कभी खाली नहीं लौटता। बाबा की मजार पर वर्ष में दो बार उर्स परंपरागत तरीके से होता है। मोहर्रम महीने में समद शाह के पीर बाबा ताजुद्दीन की यादगार में तो रमजान माह के 14, 15 तारीख को बाबा अब्दुल समद शाह की यादगार में होता है। सूफी संत का सेहरा प्राप्त बाबा अब्दुल समद शाह का जन्म एक सिजरे के मुताबिक अंग्रेजी तारीख के मुताबिक जुलाई 1882 ईसवी में भीखीपुर गांव में हुआ था।
बाबा ने अपना पर्दा इस्लामी तारीख के मुताबिक 14 रमजान 1385 हिजरी हिंदी मांह के पूर्णमासी संवत 2022 और अंग्रेजी तारीख के मुताबिक 7 जनवरी 1966 को जुमे के दिन उस वक्त हुआ था जब मस्जिद में खुतबा हो रहा था। अमेठी जनपद क्षेत्र के तिलोई विधानसभा के भीखीपुर गांव में स्थित बाबा अब्दुल समद शाह की मजार गंगा जमुनी संस्कृत की अनुपम छटा बिखेर दी है। मजार पर सभी धर्म के लोगों की बड़ी आस्था है। बाबा समद शाह ने अपनी शिक्षा मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के छोटे बेटे बाबा अब्दुल लतीफ शाह से ली थी।
बताते हैं कि भीखीपुर के आसपास अशिक्षा का काफी अभाव था बाबा ने अपने जीवन काल में शिक्षा का प्रचार-प्रसार किया जिससे उनकी शोहरत दूर दूर तक फैल गयी। बाबा आजाद किस्म के थे उनकी खास बात यह थी कि वह कभी पीछे मुड़कर नहीं देखते थे। कहते हैं कि एक बार वह लापता हो गए परिजनों की काफी खोजबीन के बाद जब पता चला कि ब्रह्मा देश में पहुंचकर बंदोबस्त महकमे में अमीन की नौकरी कर ली है। जब वहां से वापस आए तो नागपुर चले गए जहां घाटी के पास वाकी शरीफ के जंगल में समद शाह की मुलाकात नागपुर में बाबा ताजुद्दीन से हो गई।
बाबा समद शाह नागपुर से अपने कर्म स्थली भीखीपुर वापस आए और 40 दिनों तक एक बंद कमरे में बताशा एक घड़ा पानी लेकर इबादत में लग गए 40 दिन पूरा होने पर बाबा ने जब अपना कमरा खोला तो हजारों का हुजूम बाबा के दर्शन के लिए उमड़ पड़ा बाबा जिसे फूंक मारते या पानी दे देते उससे लोगों को काफी शिफा होने लगी। बाबा की लोकप्रियता देख कर ब्रिटिश हुकूमत के हाथ पैर फूल गए और पानी व मिट्टी की जांच कराई गई। लेकिन सरकार को खुफिया रिपोर्ट मिली की भीड़ बढ़ती जा रही है लोगों का कहना है कि विदेशों से भी भीखीपुर लोग तशरीफ लाए।
गांव के बुजुर्ग आज भी बताते हैं कि जायस होकर अकबर गंज रेलवे स्टेशन तक रेलवे लाइन बिछाने का निर्देश तत्कालीन हुकूमत ने भी दिया था सरकार ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि बाबा की करामात के आगे सरकारी तंत्र फेल हो गया है कई वर्षों तक लोगों का आवागमन बना रहा 1914 में उसी समय जंग शुरू हुई और बाबा समद शाह नागपुर पुनः चले गए और कई वर्ष तक अपने पीर बाबा ताजुद्दीन की खिदमत में लगे रहे एक दिन बाबा ताजुद्दीन ने अपना ख़िरका (वस्त्र) देकर समद शाह को भीखीपुर भेज दिया जिनकी करामात आज भी है।
बाबा अब्दुल समद शाह ने इस्लामी शिक्षा के लिए मदरसे खुलवाएं लोगों को सत्य व नेक रास्ते पर चलने की बात हमेशा किया करते थे। सच्चाई के मार्गदर्शक रहे बाबा पर्दा तो जरूर कर गए लेकिन अपनी कर्म स्थली को चकाचौंध कर गए हर वर्ष कई प्रांतों के श्रद्धालु और उलेमा ए इकराम तथा शोरा इकराम पहुंचकर बाबा की मजार पर खिराजे से तहसीन पेश करते हैं। आस्था एवं श्रद्धा से लबरेज जायरीनों से भीखीपुर गुलजार है।
उर्स में आने वाले बाबा के हजारों मुरीदीन सज्जादा नशीन जफरुल हसन ताजी से मिलकर अपनी अकीदत पेश करते हैं। बाबा ताजुद्दीन नागपुरी के ख़िरक़े आज भी भीखीपुर में शीशे के अंदर सुरक्षित रखे हैं जो जियारत के समय खोले जाते हैं।शांति पूर्वक उर्स सम्पन्न हो गया है सुरक्षा व्यवस्था के लिहाज से पुलिस के जवान चप्पे चप्पे पर तैनात रहे।


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