सुनील उपाध्याय
बस्ती। जिले में बंद हो रही वाल्टरगंज शुगर मिल को चलाने को लेकर सियासत तेज हो गई है। जिले के दो विधायकों ने मिल गेट पर धरना दे रहे कर्मचारियों के बीच घंटों गुजार इस बात का आश्वासन दिया है कि वे मिल कर्मचारियों और किसानों के साथ हैं और हर हाल में मिल को चलाने की कोशिश होगी।
वाल्टरगंज शुगर मिल के बंदी की सूचना मिलते ही बीजेपी नेताओं ने घड़ियाली आंसू बहाना शुरू कर दिया है आपको बता दें की बस्ती जिले में चल रही तीन चीनी मिलों में पहले बस्ती शुगर मिल बंद हुई और अब वाल्टरगंज शुगर मिल में भी ताला लग गया। इसका खुलासा तब हुआ जब मिल कर्मचारियों ने चालू करने में हो रही देरी को लेकर धरना शुरू कर दिया इसी दौरान तीन कर्मचारी पेट्रोल की बोतल के साथ मिल चिमनी पर चढ़ गए और वही आग लगाकर आत्मदाह करने की धमकी दे दिए।
इसकी सूचना जिला प्रशासन को मिली तो आनन-फानन में कर्मचारियों को चिमनी से उतारकर आश्वासन दिया गया कि मिल चलाने के निर्णय पर प्रबंधन से बात कर सूचित किया जाएगा। मामला रोजी रोटी से जुड़ा देख जिलामजिस्ट्रेट डॉ राजशेखर ने गंभीरता समझ मिल प्रबंधन कर्मचारियों और किसानों की आपातकालीन मीटिंग बुलाई। बैठक में बजाज ग्रुप की सहयोगी कंपनी फेनिल ग्रुप ने साफ-साफ बता दिया कि कंपनी अब शुगर मिल चलाने के मूड में नहीं है और इसे बेचने का सौदा हो गया है। फिर भी बकाया वेतन और गन्ना मूल्य का भुगतान इसी महीने में कर दिया जाएगा।
इस निर्णय से विधानसभा चुनाव में किसानों से किये वादे को टूटते देख जिले के बस्ती सदर के विधायक दयाराम चौधरी और रुधौली के विधायक संजय प्रताप जायसवाल मिल गेट पर अचानक पहुंच गए और कामगारों, किसानों के धरने के कार्यक्रम में खुद को शामिल कर पक्का आश्वासन दिया कि हर हाल में मिल को चलाया जाएगा इसके लिए चाहे जो भी प्रयास करना पड़े शासन स्तर से और उनके स्तर से ईमानदारी से प्रयास किया जाएगा लेकिन सवाल यह है कि जब मिल मालिकानों ने फैक्ट्री बंद करने का निर्णय ले लिया है और अभी नए मालिक का चुनाव नहीं हो सका है तो फिर इतनी जल्दी मौजूदा सीजन में मिल चलने के क्या आसार हैं।
नेताओं को फिक्र इस बात की है कि जिन आश्वासनों के बल पर भारतीय जनता पार्टी ने बस्ती के पांच सीटों सहित उत्तर प्रदेश में भारी बहुमत से सरकार बनाई है तो फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में मिल बंदी का फैसला कहीं पैर में कुल्हाड़ी तो नही मार देगी। क्योंकि प्रबंधन अगर चलती मिल को बेचने का सौदा लगभग एक साल से कर रहा था और उसकी भनक तक इन नेताओं को नहीं लगी तो इससे समझा जा सकता है कि ऐसे लोग किसानों कामगारों के प्रति कितने संवेदनशील हैं।


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