सुनील गिरी
कुंभ नगरी/प्रयागराज। दिव्य कुंभ मेला प्रयागराज में पहली बार विश्व के विभिन्न धर्मों के अनेक धर्मगुरूओं, राजनेताओं और तकनीक विशेषज्ञों ने ’’SHE ग्लोबल समिट’’ का दीप प्रज्जवलित कर उद्घाटन किया। इस ऐतिहासिक समिट का आयोजन परमार्थ निकेतन शिविर सेक्टर नंबर 18 अरैल क्षेत्र में किया गया।
बाल विवाह, लिंग आधारित असमानता, मासिक धर्म, महिला सशिक्तकरण, महिला उत्थान हेतु संगम के पावन तट ’शक्ति कुंभ शिखर सम्मेलन’ का आयोजन किया गया ताकि कुंभ में आये लाखों श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन किया जा सके।
यह कार्यक्रम ग्लोबल इण्टरफेथ वाश एलायंस, परमार्थ निकेतन के तत्वाधान में, डब्ल्यू. एस. एस. सी. सी. व यूनिसेफ के तकनीकी सहयोग से, महिला और बाल विकास विभाग, उत्तरप्रदेश सरकार के प्रयासों से आयोजित किया जा रहा है।
लोक सभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने कहा, ’’यह शक्ति कुंभ का मंच नहीं बल्कि व्यासपीठ है। जिन्होंने पूरा जीवन समाज के लिए समर्पित किया ऐसी महान विभूतियों का महासंगम परमार्थ निकेतन शिविर में हुआ है जो चाहते हैं कि भारत में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति का कल्याण हो आज उस शक्ति को जगाने का कार्य इस समिट के माध्यम से हो रहा है यह अत्यंत प्रसन्नता का विषय है।
केन्द्रीय राज्य मंत्री भारत सरकार सत्यपाल ने कहा कि ’’समाज और देश के अन्दर जितनी भी अपराध रूपी बीमारियां है इन सब के समाधान का एक ही अमृत कलश है वह है नारियों का सश्क्तिकरण। जिस दिन नारियों का सश्क्तिकरण होगा उस दिन इस देश की सारी समस्याओं का समाधान होगा।
यूपी कैबिनेट मंत्री रीता बहुगुणा ने कहा कि मनुष्य को जो भी चीजें जो जीवनदायिनी है वह सभी माँ के स्वरूप से ही प्राप्त हुयी है। संसार की सारी शक्तियों की संचालक नारी शक्ति ही है अतः महिलाओं को गर्व होना चाहिये कि मैं महिला हूँ।
परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि ’’संगम के पावन तट पर यह एक बहुत ही ऐतिहासिक पल है। हम यहां पर हम सभी उन मुद्दों पर बात करने वाले हैं जिसके कारण आज पूरा विश्व परेशान है, कुंभ एक शानदार अवसर है इसके माध्यम से हम दुनिया के अनेक लोगों तक संदेश पहुंचा सकते है। पहली बार वर्ष 2001 के कुम्भ में ग्रीन और क्लीन कुम्भ का संदेश प्रसारित किया था। आज हम सभी बाल विवाह, मासिक धर्म, महिला सशिक्तकरण जैसे मुद्दों पर अपनी चुप्पी तोड़कर एकजुट होकर नये विश्व के निर्माण का संकल्प लें। उन्होंने कहा कि ’’हम स्वयं परिवर्तन बनें और परिवर्तन लायें।’’
जीवा की अन्तर्राष्ट्रीय महासचिव साध्वी भगवती सरस्वती ने कहा कि छोटे बच्चों की शादी करना मानवता के खिलाफ अपराध है इसमें शारीरिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और भावनात्मक स्तर पर बदलाव करने की जरूरत है। युवाओं को शिक्षा के साथ संस्कारों की भी नितांत आवश्यकता है। आज समाज को सीएसआर कार्पोरेट सोशल दायित्व, के साथ कथाकार सोशल दायित्व भी जरूरी है। ताकि कथाओं और आध्यात्मिक आयोजनों के साथ समाज को जागरूकता का संदेश दिया जा सके।
साध्वी ने कहा समाधान का अर्थ है कि हम समाधान है, हमें अपने विचारों और व्यवहार को बदलना होगा तभी हम एक बेहतर राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।
गुरू माँ आनन्दमूर्ति ने नारियों से आह्वान किया कि नारियाँ अपना स्वयं का सम्मान करना सीखे। विद्या, ज्ञान, तपस्या का अधिकार सभी का है। उन्होंने कहा कि हर नारी स्वयं एक मद्रालसा बनें; रानी लक्ष्मीबाई बनें वह स्वयं एक सशक्ता होकर आगे बढ़े।
बेस्रिया और हर्जिगोविना के पूर्व प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति हरिस सिलाज्दिविक ने कहा कि यह संगम संस्कृतियों के आदान-प्रदान का संगम है। हमें अपनी तकनीक का उपयोग सही दिशा में करना चाहिये तभी हम दुनिया में परिवर्तन ला सकते है।
बिन्नी सरीन ने कहा कि हम सभी जागरूकता का संकल्प करे हमें अपने समुदाय में अपने बच्चों को श्रेष्ठ नेता बनाने की जरूरत है।
माँ करूणामयी अम्मा ने कहा की भारतीय महिलायें आध्यात्मिक महिलायें है जिस प्रकार हम एक पौधें के सुरक्षित विकास के लिये प्रयत्न करते है उसी तरह हमें अपने बच्चों को नैतिक मूल्यों के साथ विकसित करना होगा।
डब्ल्यू. एस. एस. सी. सी. की उप कार्यकारी निदेशक सु कोट्स ने कहा कि बाल विवाह से छोटी लड़कियों के दिल पर बहुत आघात करने वाला प्रभाव पड़ता है। वे अपने जीवन की जिम्मेदारी नहीं ले सकती और उन पर पूरे परिवार का बोझ डाला जाता है तब वह किस दौर से गुजरती है इसे अनुभव नहीं किया जा सकता है।
बेस्रिया और हर्जिगोविना के पूर्व प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की धर्मपत्नी सेल्मा ने महिला अधिकारों के बारे में बात करते हुये कहा कि बच्चों के श्रेष्ठ विकास के लिए माताओं और शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान से साध्वी ओम प्रभा भारती ने कहा कि हम पर्यावरण संरक्षण, गरीब बच्चों की शिक्षा और महिला सश्क्तिकरण के लिये कार्यकर रहे है हमने जाना कि विचार परिवर्तन से ही दुनिया में परिवर्तन आ सकता है।
साध्वी रूचिका भारती ने कहा कि हमें अपनी जड़ों से जुड़कर रहना चाहिये और हमें उन्हें स्वच्छ पोषण देना होगा अगर जड़े प्रदूषित होगी हो पत्तियां भी प्रदूषित ही निकलेगी।
मंहत दिव्या गिरि ने कहा कि शिक्षा के माध्यम से ही महिलायें सुखद भविष्य का निर्माण कर सकती है।
देवी मोहन जी, मोहन जी फाउण्डेशन, कहा कि शिव और शक्ति के बैंलेस की तरह ही हमें बेटे और बेटियों के पोषण में बैंलेस रखना होगा।
मध्यप्रदेश से आयी साध्वी प्राची कल्पना ने कहा कि करूणा, त्याग और तप के साथ मातायें अपने बच्चों को विकास करें।
ब्रह्मकुमारी सुदेश ने कहा कि हम सशक्त नींव प्रोजेक्ट के माध्यम से नुक्कड़ नाटक द्वारा महिला सश्क्तिकरण हेतु जागरूक करते हैं।
शिखर सम्मेलन का मुख्य आकर्षण शार्ट फिल्म, ’’मेरी जिन्दगी’’ सर्व-महिला राॅक बैंड ने सुन्दर प्रस्तुति दी। तत्पश्चात इंटरेक्टिव गेम्स हुये। प्रयागराज की 150 से अधिक स्वच्छता कर्मी बहनों को साड़ी भेंट कर सम्मानित किया गया। समिट के समापन अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती महाराज ने संकल्प कराया और भव्य शोभायात्रा निकाली। इस अवसर पर डब्ल्यू. एस. एस. सी. सी. विनोद मिश्रा, मेयर प्रयागराज अभिलाषा, गंगा नन्दिनी, स्वामिनी आदित्यनन्दा सरस्वती, डाॅ रजना विमल समेत कई लोग मौजूद रहे। सभी ने मिलकर वाटर ब्लेसिंग सेरेमनी सम्पन्न की।
सभी पूज्य संतों एवं विशिष्ट अतिथियों ने संगम आरती अरैल घाट में सहभाग किया।
भारतीय कानून के अनुसार, शादी क उम्र 18 वर्ष और पुरूषों की उम्र 21 वर्ष है परन्तु अधिकांश बाल विवाह में कम उम्र की महिलायें शामिल होती है।
बाल विवाह के परिणाम-बाल विवाह के परिणामस्वरूप विशेषकर लड़कियोेें पर हानिकारक प्रभाव पड़ते है।
बाल विवाह से एक लड़की के स्वास्थ्य पर, शारीरिक और उसके व्यक्तिगत विकास पर भी प्रभाव पड़ता है जिससे उसको शिक्षा के अवसर भी प्राप्त नहीं हो पाते।
लड़कों को भी बाल विवाह के कारण स्कूल छोड़कर बाल श्रम की ओर धकेला जाता है उन्हें काम करने के लिये मजबूर किया जाता है इसलिये उनका परिवार कभी भी बाल श्रम, गरीबी, अशिक्षा के चक्र को तोड़ नहीं पाता।
18 वर्ष से पहले विवाहित लड़कियों को अलगाव, घरेलू हिंसा और यौन शोषण जैसे अतिसंवेदनशील कृत्यों से गुजरना पड़ता है।
बच्चे एक ऐसी उम्र में जब वे अपनी देखभाल करने में जैसे तैसे सक्षम होते है तभी उनके युवा कंधों पर पारिवारिक जिम्मेदारियों का भारी बोझ डाल दिया जाता जो उनके कंधे बोझ उठाने के लिये तैयार भी नहीं होते।
उत्तररप्रदेश राज्य में बाल विवाह की स्थिति - जनगणना 2011 और एन एफ एच एस 4 के आंकड़ोें के अनुसार, हर पांच में से एक महिला कि 18 वर्ष से पहले शादी की सूचना प्राप्त हुयी। राज्य में 2 मिलियन बाल वधू हैं। यूपी के पांच जिले भारत के उन 50 जिलों में शामिल हैं जिनमें श्रावस्ती में बाल विवाह का सर्वाधिक प्रचलन है और 68u5 प्रतिशत की व्यापकता के साथ यह सूची में सबसे उपर है।
मूल संदेश- बाल विवाह मानव अधिकारों का उल्लंघन है, कानून की दृष्टि से संविधान के अनुसार लिंग, जाति, पंथ के बच्चें हो उनके अधिकारों की रक्षा करना हम सभी को कर्तव्य है।
लड़कियां ’’पराया धन नहीं है’’ उन्हें शिक्षा, समग्र विकास और सुरक्षा के समान अवसर और अधिकार मिलने चाहिये। आईये हम लड़कियों को अपनी संपत्ति के रूप में सोचें।
बेटियों को अपना गौरव बनायें
बाल विवाह से बाल श्रम को बढ़ावा मिलता है इससे देश में अशिक्षित और अकुशल युवाओं का एक बड़ा वर्ग खड़ा कर रहे है आओं हम इस चक्र को तोड़े।




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