अक्षर-अक्षर बोऊगी मै
अक्षर-अक्षर पढ़ना तुम|
मै शब्दों की करती खेती
इन शब्दों को गढ़ना तुम||
देती जल मै आदर्शों का
और खाद अपनी संस्कृति का
रोज छन्द की करूँ निराई,
इनको मन मे मढ़ना तुम|
मै शब्दों की करती खेती
इन शब्दों को गढ़ना तुम||
मेहनत की लागत मत देना
पर चख कर हिम्मत तो देना
बीज बुआई के ला पाऊ
इतनी तुम ताकत तो देना
भावों की है इसमे बाली
लेकर आगे बढ़ना तुम|
मै शब्दों की करती खेती
इन शब्दों को गढ़ना तुम||
है गरीब हर कृषक शिवी पर
फिर भी पेट सभी का भरता
हो खुद भूँखा भले मगर पर
पालन पोषण जग का करता
इन शब्दों के पोषण ले लो
प्रगति अभ्र पर चढ़ना तुम|
मै शब्दों की करती खेती
इन शब्दो को गढ़ना तुम||
डॉ.शिवानी सिंह,जौनपुर (यूपी)


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