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पढ़िए डॉ.शिवानी सिंह की काव्य रचना "मन की बात"






मन की बात
नकल बिकती है क्योंकि वो धनवान है!
अकल बिक नही सकती क्योंकि उसमे स्वाभिमान है!
उसूल पीछे रह जाते हैं क्योंकि उनमे जिन्दा ईमान है!
झूँठ पैर जमा लेता है क्योकिं वह बलवान है!
सच डरता नही पर उसकी कोई सुनता नही,लोग
बिक रहे हैं चारो तरफ भेड़ बकरियों की तरह, 
जो नही बिकता मूर्ख, बेवकूफ,अड़ियल ,बद्जुबान है!
जमाना सच मे लद गया संस्कारों का ईमानदारों का हर ओर जमावड़ा है धोखेबाजों गद्दारों का ,
महलो मे सोते है मक्कार!
गली गली ठोकर खाते हैं ईमानदार! 
राम की धरती पर रावण ठहाके मार कर हस पड़ा ,
एक तरफ लाचार मर्यादा का भार सर पर रखे 
भारत का संस्कार लाचार बूढ़े की तरह देखता रहा बेबस सा खड़ा |
बचा कुछ नही है और खोने को,
उद्देश्यों को मूल्यों को खाक होने को,
बैठा है जब दुःशासन स्वयं न्याय करने,
युधिष्ठिर फिर कठघरे मे वाह क्या कहने||

डॉ.शिवानी सिंह "मुस्कान"
          प्रवक्ता
राष्टीय पी• जी• कालेज सुजानगंज, जौनपुर (यूपी)

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