अखिलेश्वर तिवारी/आदेश तिवारी
बलरामपुर ।। इस्लामिक कैलेंडर के सबसे पवित्र महीने माह-ए-रमज़ान की शुरुआत हो चुकी है। यह क़ुरआन शरीफ के दुनिया में नाजिल होने का महीना है। यह महीना हम सबको नेकियों, आत्मसंयम और आत्मनियंत्रण का अवसर और समूची मानव जाति को प्रेम, करुणा और भाईचारे का संदेश देता है।
नफ़रत और हिंसा से भरे इस दौर में रमजान का यह संदेश पहले से और ज्यादा प्रासंगिक हो चला है। मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम के मुताबिक 'रोजा बन्दों को जब्ते नफ्स अर्थात आत्मनियंत्रण की तरबियत देता है और उनमें परहेजगारी अर्थात आत्मसंयम पैदा करता है।' हम सब जिस्म और रूह दोनों के समन्वय के नतीजें हैं।
आम तौर पर हमारा जीवन जिस्म की ज़रूरतों - भूख, प्यास, आदि के गिर्द घूमता है। रमजान का महीना दुनियावी चीजों पर नियंत्रण रखने की साधना है। जिस रूह को हम साल भर भुलाए रहते हैं, माहे रमज़ान उसी को पहचानने और जगाने का आयोजन है।
रोजे में उपवास और जल-त्याग का मक़सद यह है कि आप दुनिया के भूखे और प्यासे लोगों का दर्द महसूस कर सकें। रोजे में परहेज, आत्मसंयम और ज़कात का मक़सद यह है कि आप अपनी ज़रूरतों में थोड़ी-बहुत कटौती कर समाज के अभावग्रस्त लोगों की कुछ ज़रूरतें पूरी कर सकें।
रोज़ा सिर्फ मुंह और पेट का ही नहीं, आंख, कान, नाक और ज़ुबान का भी होता है। यह सदाचार और पाकीज़गी की शर्त है ! रमज़ान रोज़ादारों को आत्मावलोकन और ख़ुद में सुधार का मौका देता है। दूसरों को नसीहत देने के बजाय अगर हम अपनी कमियों को पहचान कर उन्हें दूर कर सकें तो हमारी दुनिया ज्यादा मानवीय होगी।
रमज़ान के महीने को तीन हिस्सों या अशरा में बांटा गया है। महीने के पहले दस दिन 'रहमत' के हैं जिसमें अल्लाह रोजेदारों पर रहमतों की बारिश करता है। दूसरा अशरा 'बरकत' का है जब अल्लाह रोजेदारों पर बरकत नाजिल करता है। रमज़ान का तीसरा अशरा ‘मगफिरत’ का है जब अल्लाह अपने बंदों को गुनाहों से पाक कर देता है।


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