अखिलेश्वर तिवारी
बलरामपुर ।। जनपद के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी ग्राम पंचायत स्तर पर बेसिक शिक्षा विभाग, कार्यक्रम विभाग तथा पंचायजीराज विभाग से समन्वय बनाकर स्कूलों व अन्य बच्चों का चिन्हांकन कराकर सूची तैयार कर लें तथा यह सुनिश्चित करें कि हर बच्चे को प्रत्येक दशा में एलबेण्डाजाॅल की गोलियां दी जा सकें। जनपद व ब्लाक स्तरीय अधिकारियों को नोडल नामित कराकर सघन मानीटरिंग कराई जाए।
यह निर्देश मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ घनश्याम सिंह ने शासन के निर्देशों के क्रम में एक विज्ञप्ति जारी कर दिए हैं । सीएमओ ने अपने अधीनस्थ सभी प्रभारी चिकित्सा अधिकारियों स्वास्थ्य केंद्र अधीक्षक को सख्त निर्देश दिए कि वे प्रत्येक दशा में सुनिश्चित करें कि जिले के हर प्राथमिक विद्यालयों उच्च प्राथमिक विद्यालय मदरसा इंटर कॉलेज मान्यता प्राप्त हुआ गैर मान्यता प्राप्त स्कूल कॉलेज डिग्री कॉलेज आईटीआई या अन्य ऐसे सभी संस्थान आंगनबाड़ी केन्द्रों पर समय से कृमि रोधी दवा एल्बेन्डाजाल पहुंचा दी जाय। इसका कोई भी साइड इफेक्ट नहीं है। उन्होने कहा कि यह दवा बच्चों को खाली पेट किसी भी दशा में नहीं देनी है। उन्होने निर्देश दिए कि सभी जगहों पर यह सुनिश्चित किया जाय कि बच्चे एल्वेन्डाजाॅल की गोलियां हर हाल में खा लें। मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने बताया कि आगामी 29 अगस्त को तथा 30 अगस्त से 4 सितम्बर तक माॅप अप सप्ताह चलाया जाएगा जिसमें हर बच्चे को एल्बेन्डाजाॅल की गोलियां खिलाईं जाएगीं।
कृमि संक्रमण से निपटने के लिए ‘एल्बेंडाजोल’ एक प्रभावी दवा हैकृमि मुक्ति की दवा का दुष्प्रभाव बहुत कम है, लेकिन जिन बच्चों में कृमि की मात्रा ज्यादा होती है, वे उनींदापन, पेट दर्द, दस्त, डायरिया और थकान का अनुभव कर सकते हैं। स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किये गये हैं। कृमि से मुक्ति पाने के अलावा स्वास्थ्य और साफ-सफाई की अच्छी आदतों से बच्चे के साथ-साथ समुदाय भी कृमि संक्रमण से सुरक्षित रह सकते हैं। परजीवी कृमि संक्रमण को नेमाटोड संक्रमण भी कहते हैं। ये संक्रमण हैलिमिंथियासिस जैसा संक्रमण होता है, जो नेमाटोड फायलम के जीवों द्वारा होता है। नीमाटोड परजीवी होते हैं। परजीवी (पैरासाइट्स) वह कीटाणु है जो व्यक्ति में प्रवेश करके बाहर या भीतर (ऊतकों या इंद्रियों से) जुड़ जाती है और सारे पोषक तत्व को चूस लेती है। कुछ परजीवी अर्थात कृमि अंततः कमजोर पड़कर व्यक्ति में बीमारी फैलाते हैं। कृमि (गोल कृमि) लंबे, आवरणहीन और बिना हड्डी वाले होते हैं। इनके बच्चे अंडे या कृमि कोष से डिंभक (लारवल) (सेता हुआ नया कृमि) के रूप में बढ़ते हुए त्वचा, मांसपेशियां, फेफड़ा या आंत (आंत या पाचन मार्ग) के उस ऊतक (टिशू) में कृमि के रूप बढ़ते जाते हैं जिसे वे संक्रमित करते हैं।
क्या हैं कृमि के लक्षण
कृमि के लक्षण उसके रहने के स्थान पर निर्भर करते हैं। कोई लक्षण नहीं होता है या नगण्य होता है। लक्षण एकाएक दिखने लगते हैं या कभी-कभी लक्षण दिखाई देने में 20 वर्षों से ज्यादा का समय लग जाता है। एक बार में पूरी तरह निकल जाते हैं या मल में थोड़ा-थोड़ा करके निकलते हैं। पाचन मार्ग (पेट, आंत, जठर, वृहदांत्र और मलाशय) आंत की कृमियों से मिलकर पेट दर्द, कमजोरी, डायरिया, भूख न लगना, वजन कम होना, उल्टी, अरक्तता, कुपोषण जैसे विटामिन (बी 12), खनिज (लौह), वसा और प्रोटीन की कमी को जन्म देती है। मलद्वार और योनि के आसपास खुजली, नींद न आना, बिस्तर में पेशाब और पेट दर्द पिनकृमि के संक्रमण के लक्षण हैं। त्वचा-उभार, पीव लिए हुए फफोले, चेहरे पर बहुत ज्यादा सूजन, विशेषकर आंखों के आसपास एलर्जी संबंधी प्रतिक्रिया-त्वचा लाल हो जाना, त्वचा में खुजली और मलद्वार के चारों ओर खुजली जठर फ्लूकः बढ़ी हुई नाजुक जठर, ज्वर, पेट दर्द, डायरिया, त्वचा पीला पड़ना लसिका युक्त-सूजे हुए हाथी के पाव जैसे या अंडग्रंथि।
जानें क्यां हैं कृमि होने के कारक
मलीय संदूषित जल, अस्वास्थ्यकर स्थितियां, मांस या मछली को कच्चा या अधपका खाना, पशुओं को अस्वास्थ्यकर वातावरण में पालना, कीड़ों व चूहों से संदूषण, रोगी और कमजोर व्यक्ति, अधिक मच्छरों व मक्खियों का होना, खेल के मैदान जहां बच्चे मिट्टी के संपर्क में आते हों और वहां कुछ खाते हों।


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