सरकार की मंशा पर पानी फेर रहे जिम्मेदार, माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई की दरकार
ए. आर. उस्मानी
गोण्डा। वैसे तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तथा वन्य जीव संरक्षण मंत्री दारा सिंह चौहान सूबे में वृक्षारोपण महाभियान चलाकर पर्यावरण संरक्षण के लिए अरबों रूपये खर्च कर चुके हैं, लेकिन पुलिस और वन महकमा मोटी कमाई के लिए वन माफियाओं से साठगांठ कर प्रतिबंधित वृक्षों का सफाया करा रहा है। जिले के मोतीगंज थाना क्षेत्र में तो पुलिस तथा वन विभाग के लोग सरकार के मंसूबे पर पानी फेर रहे हैं। ताजा मामला मोतीगंज के इमिलिया नयी बस्ती गांव का है। पुलिस तथा वन विभाग की मिलीभगत से इस गांव में आम के दो तथा कटहल का एक पेड़ ठेकेदार द्वारा कटवा लिया गया। सोलह अगस्त को जब लकड़ी ट्रैक्टर ट्रॉली पर लादी जा रही थी तब इसकी शिकायत डीआईजी से की गई।
सूचना को गंभीरता से लेते हुए डीआईजी देवीपाटन परिक्षेत्र राकेश सिंह ने तत्काल कार्रवाई का निर्देश दिया। इसकी जानकारी जब पुलिस अधीक्षक आरके नैय्यर को हुई तब मोतीगंज पुलिस हरकत में आई और आनन-फानन में लकड़ी लदी ट्रैक्टर ट्रॉली को चालक व ठेकेदार समेत कब्जे में ले लिया। इस सम्बंध में मोतीगंज थाने में चोरी से पेड़ काटने का मामला दर्ज कर लकड़ी तथा ट्रैक्टर ट्रॉली को सीज कर दिया गया। बताते चलें कि 16 अगस्त को ही मोतीगंज थाना क्षेत्र के मंगरावां गांव में स्थित प्राइमरी स्कूल के पास बेशकीमती सागौन के करीब 20 पेड़ों को धराशायी कर दिया गया। इस संबंध में भी डीआईजी से शिकायत की गई, जिसका उन्होंने संज्ञान लेते हुए तत्काल कार्रवाई के लिए निर्देशित किया। पुलिस अधीक्षक आरके नैयर ने भी प्रभारी निरीक्षक मोतीगंज को आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया लेकिन पुलिस टस से मस नहीं हुई और ठेकेदार आराम से पेड़ों को कटवाकर लेकर चला गया।
इसी तरह बनकसिया गांव में नीम के पेड़ को पुलिस तथा वन विभाग की मिलीभगत से काट लिया गया। जोलहटी गांव में सागौन के पेड़ों को धराशाई कर दिया गया तो गढ़ी में भी आम के पेड़ को कटवा लिया गया। सूत्र बताते हैं कि मोतीगंज थाना क्षेत्र में प्रतिदिन हरे भरे प्रतिबंधित पेड़ों की खुलेआम कटान होती है जिसके बदले में पुलिस तथा वन विभाग एक निश्चित मोटी रकम लेता है। मोतीगंज थाना क्षेत्र के ककरहवा गांव में शीशम के करीब 100 पेड़ों को पुलिस व वन विभाग की साठगांठ से काट डाला गया। इसकी शिकायत मुख्यमंत्री पोर्टल के साथ ही डीएफओ से भी की गई, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई।
परमिट के नाम पर खेला जाता है "खेल"
बता दें कि वन माफिया परमिट की आड़ में लाखों रूपए का खेल खेलने का काम करते हैं। सूत्र बताते हैं कि वन माफिया दो-चार पेड़ों का परमिट बनवा कर पूरी बाग को उजाड़ने का काम करते हैं। इसमें विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों की भी संलिप्तता रहती है। बताया जाता है कि परमिट वन माफियाओं अथवा ठेकेदारों के नाम न बनवाकर किसानों के नाम बनवाए जाते हैं। विभाग द्वारा हरे भरे पेड़ों को रोगग्रस्त दिखाकर वन माफियाओं को परमिट देने का काम किया जाता है। वहीं पेड़ों की जांच के नाम पर मौके पर भी नहीं जाया जाता है। बहुत से मामले तो इस प्रकार के भी देखे गए हैं कि ग्राम समाज व सरकारी जमीन पर लगे पेड़ों तक की परमिट वन विभाग द्वारा जारी कर दी गयी है। दरअसल, सब रूपयों का खेल है। सरकार वृहद स्तर पर प्रदेशभर में वृक्षारोपण महाअभियान चलाकर पर्यावरण संरक्षण का प्रयास कर रही है, जबकि वन और पुलिस विभाग सरकार की मंशा पर पानी फेरते हुए वृक्षों के सफाए के लिए अभियान चला रहे हैं।



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